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महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा

 महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा आज 11 सितम्बर है। पूरे उन्तालीस बरस हुए महादेवी जी को गए। नीर भरी दुख की बदली के साथ उनमें एक अग्निरेखा भी थी, जो जीवन और साहित्य के बीच में कहीं खिंची हुई थी।  हिंदी साहित्य के आकाश में कुछ ऐसे सितारे हैं, जिनका प्रकाश समय बीतने के साथ कभी धुंधला नहीं पड़ता। महादेवी वर्मा उन्हीं महान साहित्यकारों में से एक हैं।    जहां ख़ुद वह दीपशिखा की तरह निरन्तर जलती रहती थीं। वह मंदिर का दीप ही थीं, जिसे सतत जलते जाना था। वह कहती भी थीं, मधुर मधुर मेरे दीपक जल। उनका प्रिय प्रतीक दिया ही था। बुद्धिसेन शर्मा की यह पंक्तियाँ, वह बहुत बहुत पसंद करती थीं, किसी ने क्या दिया जलते दिये को, दिया बस नाम उसका रख दिया है। वे केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि संवेदना, करुणा, नारी चेतना और मानवीय मूल्यों की सशक्त आवाज थीं। उनकी रचनाओं में मनुष्य के भीतर छिपे भावों को इतनी गहराई से अभिव्यक्ति मिली कि पाठक स्वयं को उनके शब्दों में महसूस करने लगता है। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चा...

शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण

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शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण एक यादगार आयोजन का आँखों देखा हाल लेखक: डॉ. राकेश राणा 7 सितंबर 2026 का दिन मेरे लिए केवल शिक्षक दिवस का एक औपचारिक अवसर नहीं था, बल्कि साहित्य, संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक ऐसा अनुभव था, जिसे लंबे समय तक स्मृतियों में संजोकर रखा जा सकेगा। प्रातः लगभग 11:30 बजे जब मैं एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के महाविद्यालय सभागार में पहुँचा, तब वहाँ का वातावरण एक सामान्य शैक्षणिक कार्यक्रम से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा था। सभागार में विद्यार्थियों की उत्सुकता, शिक्षकों के प्रति सम्मान और साहित्यिक क्लब के सदस्यों की सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। मंच सुसज्जित था और कार्यक्रम की तैयारी में जुटे विद्यार्थियों के चेहरों पर उत्साह के साथ-साथ जिम्मेदारी का भाव भी झलक रहा था। यह आयोजन एम.एम.एच. कॉलेज के साहित्यिक क्लब द्वारा ‘A Literary Dedication on Teacher’s Day’ शीर्षक से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से व्यक्त करना था। महाविद...

महिला प्रकोष्ठ की पहल पर उलझन सुलझन प्रधान संपादक की विशेष टिप्पणी

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एक अंक नहीं, एक नई शुरुआत… महिला स्वावलंबन से सामाजिक संवाद तक 1 सितंबर 2026 को उलझन सुलझन के महिला प्रकोष्ठ द्वारा महिला स्वावलंबन को समर्पित प्रथम अंक का प्रकाशन हमारे लिए केवल एक प्रकाशन-घटना नहीं है। यह उस विश्वास की शुरुआत है कि जब महिलाओं को अपनी बात कहने, अपनी प्रतिभा दिखाने और अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—वह परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचता है। इस प्रथम प्रयास के बाद प्राप्त एक विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया ने हमें रुककर सोचने का अवसर दिया। प्रतिक्रिया में मानव की आंतरिक बेचैनी, शांति की तलाश और ईश्वर की अवधारणा से लेकर आस्था के बाजारवाद में बदल जाने तक के प्रश्न उठाए गए। राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और परंपराओं के नाम पर आमजन की भूमिका तथा दूसरी ओर मानवता, समृद्धि और खुशहाली की अधूरी प्रतीक्षा की ओर भी संकेत किया गया। हम इस विचार से सहमत हों या असहमत, लेकिन इतना अवश्य मानते हैं कि प्रश्न उठना और उस प्रश्न पर संवाद होना किसी भी जीवंत समाज के लिए आवश्यक है। इसीलिए यह प्रतिक्रिया हमारे लिए आलोचना मात्र नहीं, बल्कि एक अ...

जीवन के साथ भी, मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित

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जीवन के साथ भी, मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित एक प्रेरक मिसाल श्री ईश्वर दयाल सैनी जिंदगी के साथ और मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित रहने की कहावत को चरितार्थ करने वाले बिरले ही होते हैं। और! वे तो और भी बिरले होते हैं, जो जीवन का अर्थ केवल स्वयं के लिए जीने में नहीं, बल्कि मानव जीवन की सार्थकता को दूसरों के काम आने में समझते हैं। ऐसी ही एक प्रेरक विभूति थे श्रद्धेय श्री ईश्वर दयाल सैनी जी, जिन्होंने अपने जीवनकाल में समाज, शिक्षा और नई पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी समाज के लिए कुछ छोड़ जाने का निर्णय लिया। उन्होंने मृत्यु से सात वर्ष पूर्व देहदान का संकल्प लेकर यह संदेश दिया कि मनुष्य की उपयोगिता उसके अंतिम सांस के साथ समाप्त नहीं होती। 97 वर्ष की आयु में उनके देहावसान के पश्चात उनके पुत्र श्री आदेश कुमार सैनी एवं पुत्रवधू श्रीमती विजयलता सैनी ने उनके संकल्प का सम्मान करते हुए उनकी देह को एल.एल.आर.एम. मेडिकल कॉलेज, मेरठ के शरीर रचना विज्ञान विभाग को सौंप दिया। इस प्रकार उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और भावी चिकित्सकों के अध्ययन के लिए...

विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद

विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद भूमिका मुंशी प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान कथाकार नहीं, बल्कि विश्व-यथार्थवादी साहित्य की सशक्त परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार भी हैं। उनका साहित्य भारतीय समाज की पीड़ा, संघर्ष, विषमता और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़ है। यही कारण है कि उनकी तुलना पाश्चात्य साहित्य के उन महान लेखकों से की जाती है, जिन्होंने अपने-अपने समाज के यथार्थ को साहित्य के माध्यम से अमर बना दिया। विशेष रूप से चार्ल्स डिकेंस और थॉमस हार्डी के साहित्य में प्रेमचंद की रचनात्मक दृष्टि के अनेक समान बिंदु दिखाई देते हैं। प्रस्तुत आलेख इन्हीं तुलनात्मक आयामों को संक्षेप में रेखांकित करता है। मुंशी प्रेमचंद और पाश्चात्य साहित्य : तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य मुंशी प्रेमचंद और उनके लोक-केंद्रित, यथार्थवादी साहित्य की तुलना मुख्यतः अंग्रेज़ी साहित्य के दो महान कथाकारों—चार्ल्स डिकेंस तथा थॉमस हार्डी—से की जाती है। 1. चार्ल्स डिकेंस समानता का आधार जिस प्रकार चार्ल्स डिकेंस ने विक्टोरियन युगीन इंग्लैंड के कारखानों, बाल-श्रम, निर्धनों के शोषण तथा सामाजिक विसंगतियों को अपने उ...

शख्सियत - विजया डालमिया

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शख्सियत   शाम फिर उदास है नौशाद के शब्दों में गूंजती है तेरी आवाज  अमीरों के महलों में और गरीबों के झोपड़े में भी हैं तेरे साज  यूँ तो अपनी मौसिकी पर सबको फक्र होता है मगर  ऐ मेरे साथी मौसिकी को है आज भी तुझ पर नाज। गीत हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है जो समय समय पर हमारी भावनाओं को व्यक्त करते रहते हैं। यादों के टूटे तार हो या दिल की खुशी, इन कड़ियों को अपनी आवाज से जोड़ने का काम गायक बखूबी करते हैं। इसी परंपरा में एक ऐसा सितारा भी है जिसके लिए सिर्फ यही कहूंगी कि ......"तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".... जी हाँ अपनी आवाज से खास पहचान बनाने वाले, दुनिया से जाने के बाद भी सबके दिलों पर राज कर रहे फनकार का नाम है......" मोहम्मद रफी" रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर सन 1924 में हुआ।जगह थी अमृतसर जिला और वहाँ पर कोटला सुल्तान मैं किसी ने सोचा भी नहीं था यह बच्चा एक दिन बेहतरीन गायक बन कर उनका नाम रोशन करेगा। उन्हें संगीत की कला फ्री में मिली ।सात साल की उम्र में वे एक फकीर के पीछे- पीछे उनका गाया गाना गुनगुनाते रहते थे ,जिससे उनकी आवाज में निखार आने लगा। गाना था.......

अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता

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अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता किसी ने कहा है— "जीवन की हर मंज़िल तेज़ रफ़्तार से नहीं मिलती। कुछ अनमोल चीज़ें ठहरकर ही मिलती हैं, जैसे सुख, शांति और सुकून।" यह बात लगभग हर व्यक्ति जानता है। हम बच्चों को भी यही सिखाते हैं कि धैर्य रखो, समय का सम्मान करो और जल्दबाज़ी से बचो। फिर भी आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र—परिवार, शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति, समाज और व्यक्तिगत संबंधों—में अधीरता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रश्न यह है कि जब सत्य सबको ज्ञात है, तो व्यवहार उससे इतना दूर क्यों होता जा रहा है? यदि इस प्रश्न की जड़ तक पहुँचा जाए तो एक महत्त्वपूर्ण कारण सामने आता है—अनुकरण की प्रवृत्ति। आज अधिकांश लोग अपने जीवन को अपने विवेक से कम और दूसरों को देखकर अधिक जी रहे हैं। किसी को आगे बढ़ते देखकर हमें भी उसी गति से आगे बढ़ना है; किसी को सफलता मिलती दिखाई देती है तो उसी क्षण वैसी ही सफलता हमें भी चाहिए। इस प्रकार जीवन का संचालन क्रिया से नहीं, प्रतिक्रिया से होने लगता है। जब हमारा जीवन दूसरों की गति, उपलब्धियों और अपेक्षाओं की प्रतिक्रिया बन जाता है, तब अधीरता स्वाभाविक रूप से जन्म ले...