महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा
महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा आज 11 सितम्बर है। पूरे उन्तालीस बरस हुए महादेवी जी को गए। नीर भरी दुख की बदली के साथ उनमें एक अग्निरेखा भी थी, जो जीवन और साहित्य के बीच में कहीं खिंची हुई थी। हिंदी साहित्य के आकाश में कुछ ऐसे सितारे हैं, जिनका प्रकाश समय बीतने के साथ कभी धुंधला नहीं पड़ता। महादेवी वर्मा उन्हीं महान साहित्यकारों में से एक हैं। जहां ख़ुद वह दीपशिखा की तरह निरन्तर जलती रहती थीं। वह मंदिर का दीप ही थीं, जिसे सतत जलते जाना था। वह कहती भी थीं, मधुर मधुर मेरे दीपक जल। उनका प्रिय प्रतीक दिया ही था। बुद्धिसेन शर्मा की यह पंक्तियाँ, वह बहुत बहुत पसंद करती थीं, किसी ने क्या दिया जलते दिये को, दिया बस नाम उसका रख दिया है। वे केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि संवेदना, करुणा, नारी चेतना और मानवीय मूल्यों की सशक्त आवाज थीं। उनकी रचनाओं में मनुष्य के भीतर छिपे भावों को इतनी गहराई से अभिव्यक्ति मिली कि पाठक स्वयं को उनके शब्दों में महसूस करने लगता है। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चा...