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विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद

विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद भूमिका मुंशी प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान कथाकार नहीं, बल्कि विश्व-यथार्थवादी साहित्य की सशक्त परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार भी हैं। उनका साहित्य भारतीय समाज की पीड़ा, संघर्ष, विषमता और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़ है। यही कारण है कि उनकी तुलना पाश्चात्य साहित्य के उन महान लेखकों से की जाती है, जिन्होंने अपने-अपने समाज के यथार्थ को साहित्य के माध्यम से अमर बना दिया। विशेष रूप से चार्ल्स डिकेंस और थॉमस हार्डी के साहित्य में प्रेमचंद की रचनात्मक दृष्टि के अनेक समान बिंदु दिखाई देते हैं। प्रस्तुत आलेख इन्हीं तुलनात्मक आयामों को संक्षेप में रेखांकित करता है। मुंशी प्रेमचंद और पाश्चात्य साहित्य : तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य मुंशी प्रेमचंद और उनके लोक-केंद्रित, यथार्थवादी साहित्य की तुलना मुख्यतः अंग्रेज़ी साहित्य के दो महान कथाकारों—चार्ल्स डिकेंस तथा थॉमस हार्डी—से की जाती है। 1. चार्ल्स डिकेंस समानता का आधार जिस प्रकार चार्ल्स डिकेंस ने विक्टोरियन युगीन इंग्लैंड के कारखानों, बाल-श्रम, निर्धनों के शोषण तथा सामाजिक विसंगतियों को अपने उ...

शख्सियत - विजया डालमिया

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शख्सियत   शाम फिर उदास है नौशाद के शब्दों में गूंजती है तेरी आवाज  अमीरों के महलों में और गरीबों के झोपड़े में भी हैं तेरे साज  यूँ तो अपनी मौसिकी पर सबको फक्र होता है मगर  ऐ मेरे साथी मौसिकी को है आज भी तुझ पर नाज। गीत हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है जो समय समय पर हमारी भावनाओं को व्यक्त करते रहते हैं। यादों के टूटे तार हो या दिल की खुशी, इन कड़ियों को अपनी आवाज से जोड़ने का काम गायक बखूबी करते हैं। इसी परंपरा में एक ऐसा सितारा भी है जिसके लिए सिर्फ यही कहूंगी कि ......"तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".... जी हाँ अपनी आवाज से खास पहचान बनाने वाले, दुनिया से जाने के बाद भी सबके दिलों पर राज कर रहे फनकार का नाम है......" मोहम्मद रफी" रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर सन 1924 में हुआ।जगह थी अमृतसर जिला और वहाँ पर कोटला सुल्तान मैं किसी ने सोचा भी नहीं था यह बच्चा एक दिन बेहतरीन गायक बन कर उनका नाम रोशन करेगा। उन्हें संगीत की कला फ्री में मिली ।सात साल की उम्र में वे एक फकीर के पीछे- पीछे उनका गाया गाना गुनगुनाते रहते थे ,जिससे उनकी आवाज में निखार आने लगा। गाना था.......