Posts

Showing posts from May, 2026

बुजुर्ग हैं परिवार, संस्कार और सफलता की मौन आधारशिला

Image
बुजुर्ग हैं परिवार, संस्कार और सफलता की मौन आधारशिला भूमिका बदलते समय में रिश्तों की धड़कन को सुनने की आवश्यकता क्या आपने कभी सोचा है कि पहले परिवारों में इतने लोग होते हुए भी मनमुटाव कम क्यों दिखाई देते थे? क्यों कठिन परिस्थितियों में भी रिश्तों की डोर इतनी मजबूत बनी रहती थी? आखिर वह कौन-सी शक्ति थी, जो मतभेदों को मनभेद बनने से रोक लेती थी और टूटते मन को फिर से जोड़ देती थी? आज जब दुनिया हमारी हथेली में सिमट आई है, संवाद के साधन बढ़ गए हैं, परंतु क्या सचमुच दिलों की दूरियां कम हुई हैं? क्यों एक ही छत के नीचे रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से अनजान-से होते जा रहे हैं? सुविधाओं के इस दौर में आखिर वह सुकून, वह अपनापन और वह सामूहिकता कहां छूटती जा रही है, जो कभी परिवारों की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी? शायद इन प्रश्नों के उत्तर हमें उन अनुभवी आंखों में मिल सकते हैं, जिन्होंने जीवन को केवल देखा नहीं, जिया है; उन हाथों में, जिन्होंने संघर्षों के बीच भी परिवारों को टूटने नहीं दिया; उन बुजुर्गों में, जिनकी सीख कभी घरों की नींव हुआ करती थी। बदलते परिवेश, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, तकनीक की व्यस...

जिज्ञासा और जिज्ञासा क्षुधा शांति

सोनिया सिंह 'जागृति' की जिज्ञासा इंसान प्रायः बाहर की दुनिया से नहीं, अपने ही भीतर से लड़ता है—अपने भय, असंतोष और अपेक्षाओं से। वह नाराज़ भी उसी मन से होता है, जो उसे बार-बार प्रश्नों में उलझाता है। दूसरों के दर्द से आहत होना, किसी को परेशान न देख पाना, अच्छे-बुरे का ज्ञान बाँटना और किसी के लिए फिक्रमंद रहना—ये सब मन की उसी जिज्ञासा से उपजते हैं, जो अर्थ और अपनत्व खोजती है। इसी जिज्ञासा के कारण इंसान अपनी ऊर्जा, समय, पैसा और तवज्जो वहाँ लुटाता है, जहाँ उसे अपने अस्तित्व का उत्तर मिलता प्रतीत होता है। जब यह जिज्ञासा समझ और विवेक से जुड़ती है, तब मन की क्षुधा शान्त होती है; अन्यथा वही जिज्ञासा असंतोष और द्वंद्व का कारण बन जाती है। जिज्ञासा क्षुधा-शान्ति  प्रश्नवार उत्तर एवं निष्कर्ष इंसान किससे लड़ता है? इंसान मूलतः बाहर नहीं, अपने ही भीतर के द्वंद्व से लड़ता है—अपने भय, असुरक्षा, अहं और अधूरी अपेक्षाओं से। बाहरी संघर्ष तो केवल आंतरिक युद्ध का6 प्रतिबिंब होते हैं। किस से नाराज़ होता है? वह उन्हीं से नाराज़ होता है जिनसे उसे उम्मीद होती है, पर वास्तविकता में उसकी नाराज़गी भी अक्सर...

काव्य सुरों से सजी साहित्यिक संध्या

Image
काव्य सुरों से सजी साहित्यिक संध्या  महाराष्ट्र–तेलंगाना इकाई का काव्य संगम भूमिका शब्द जब संवेदनाओं का रूप लेकर मंच पर उतरते हैं, तब कविता केवल रचना नहीं रह जाती, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति बन जाती है। साहित्य और संस्कृति के इसी सुंदर समन्वय को साकार करते हुए काव्य रसिक संस्थान महाराष्ट्र इकाई के तत्वावधान में तेलंगाना इकाई के साथ एक गरिमामयी ऑनलाइन काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। साहित्यिक सौहार्द, रचनात्मक ऊर्जा और काव्य रस से सराबोर इस आयोजन ने प्रतिभागियों और श्रोताओं के हृदय में विशेष स्थान बनाया। कार्यक्रम विवरण दिनांक 22 मई 2026, शुक्रवार को सायं 7:00 बजे गूगल मीट के माध्यम से आयोजित इस भव्य काव्य गोष्ठी में साहित्य प्रेमियों और कवि-रचनाकारों ने सहभागिता निभाई। कार्यक्रम की अध्यक्षता आदरणीय डॉ. रामकुमार रसिक जी ने की। उनके प्रेरणादायी व्यक्तित्व और साहित्यिक अनुभव ने आयोजन को गरिमा प्रदान की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में आदरणीय डॉ. रामरतन श्रीवास ‘राधे-राधे’ जी की स्नेहिल उपस्थिति रही, वहीं मुख्य अतिथि के रूप में आदरणीया डॉ. मीना जैन सुनीता जी ने अपनी गरिमामयी सहभागित...