बुजुर्ग हैं परिवार, संस्कार और सफलता की मौन आधारशिला
बुजुर्ग हैं परिवार, संस्कार और सफलता की मौन आधारशिला भूमिका बदलते समय में रिश्तों की धड़कन को सुनने की आवश्यकता क्या आपने कभी सोचा है कि पहले परिवारों में इतने लोग होते हुए भी मनमुटाव कम क्यों दिखाई देते थे? क्यों कठिन परिस्थितियों में भी रिश्तों की डोर इतनी मजबूत बनी रहती थी? आखिर वह कौन-सी शक्ति थी, जो मतभेदों को मनभेद बनने से रोक लेती थी और टूटते मन को फिर से जोड़ देती थी? आज जब दुनिया हमारी हथेली में सिमट आई है, संवाद के साधन बढ़ गए हैं, परंतु क्या सचमुच दिलों की दूरियां कम हुई हैं? क्यों एक ही छत के नीचे रहते हुए भी लोग एक-दूसरे से अनजान-से होते जा रहे हैं? सुविधाओं के इस दौर में आखिर वह सुकून, वह अपनापन और वह सामूहिकता कहां छूटती जा रही है, जो कभी परिवारों की सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी? शायद इन प्रश्नों के उत्तर हमें उन अनुभवी आंखों में मिल सकते हैं, जिन्होंने जीवन को केवल देखा नहीं, जिया है; उन हाथों में, जिन्होंने संघर्षों के बीच भी परिवारों को टूटने नहीं दिया; उन बुजुर्गों में, जिनकी सीख कभी घरों की नींव हुआ करती थी। बदलते परिवेश, एकल परिवारों की बढ़ती प्रवृत्ति, तकनीक की व्यस...