अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता
अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता
किसी ने कहा है—
"जीवन की हर मंज़िल तेज़ रफ़्तार से नहीं मिलती। कुछ अनमोल चीज़ें ठहरकर ही मिलती हैं, जैसे सुख, शांति और सुकून।"
यह बात लगभग हर व्यक्ति जानता है। हम बच्चों को भी यही सिखाते हैं कि धैर्य रखो, समय का सम्मान करो और जल्दबाज़ी से बचो। फिर भी आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र—परिवार, शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति, समाज और व्यक्तिगत संबंधों—में अधीरता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रश्न यह है कि जब सत्य सबको ज्ञात है, तो व्यवहार उससे इतना दूर क्यों होता जा रहा है?
यदि इस प्रश्न की जड़ तक पहुँचा जाए तो एक महत्त्वपूर्ण कारण सामने आता है—अनुकरण की प्रवृत्ति। आज अधिकांश लोग अपने जीवन को अपने विवेक से कम और दूसरों को देखकर अधिक जी रहे हैं। किसी को आगे बढ़ते देखकर हमें भी उसी गति से आगे बढ़ना है; किसी को सफलता मिलती दिखाई देती है तो उसी क्षण वैसी ही सफलता हमें भी चाहिए। इस प्रकार जीवन का संचालन क्रिया से नहीं, प्रतिक्रिया से होने लगता है। जब हमारा जीवन दूसरों की गति, उपलब्धियों और अपेक्षाओं की प्रतिक्रिया बन जाता है, तब अधीरता स्वाभाविक रूप से जन्म लेती है।
बीते कुछ वर्षों में तकनीकी क्रांति, सोशल मीडिया, त्वरित संचार और निरंतर तुलना ने इस प्रवृत्ति को और गहरा कर दिया है। जानकारी कुछ क्षणों में मिलने लगी, सेवाएँ तुरंत उपलब्ध होने लगीं और मन ने मान लिया कि जीवन की हर उपलब्धि भी तत्काल मिलनी चाहिए। परिणाम यह हुआ कि प्रतीक्षा करने की क्षमता घटती चली गई और धैर्य एक बोझ जैसा प्रतीत होने लगा।
वास्तव में अधीरता का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, अशांत मन है। जब मन अस्थिर होता है तो वह हर क्षण कुछ नया चाहता है, हर परिणाम तुरंत चाहता है और हर विलंब को असफलता मानने लगता है। इसलिए अधीरता केवल व्यवहार की समस्या नहीं, बल्कि मन की अवस्था है।
भारतीय चिंतन मनुष्य के व्यक्तित्व का आधार दिव्य ऊर्जा, ध्वनि, तरंग, ध्यान और योग विज्ञान को मानता है। इसका सरल अर्थ है—प्रत्येक कार्य को पूर्ण सजगता, एकाग्रता और ध्यानपूर्वक करना। जब मन वर्तमान क्षण में रहता है, तब कार्य की गुणवत्ता भी बढ़ती है और मन की शांति भी बनी रहती है। लेकिन जब मन निरंतर तुलना, चिंता और प्रतिक्रिया में उलझा रहता है, तब न कार्य में आनंद मिलता है और न परिणाम में संतोष।
इसलिए यदि अधीरता को समाप्त करना है तो केवल व्यवहार बदलने से काम नहीं चलेगा; मन को साधना होगा। यह स्मरण रखना होगा कि मन हमारे वश में है, हम मन के वश में नहीं। यदि मन को बिना दिशा दिए छोड़ दिया जाए तो वह इच्छाओं, भय, तुलना और प्रतिक्रियाओं के पीछे दौड़ता रहेगा। किंतु यदि उसे विवेक, ध्यान और आत्मानुशासन का अभ्यास कराया जाए, तो वही मन हमारा सबसे बड़ा सहयोगी बन जाता है।
इस दिशा में कुछ छोटे-छोटे अभ्यास अत्यंत प्रभावी हो सकते हैं—
* प्रत्येक दिन कुछ समय मौन और आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालें।
* किसी भी महत्त्वपूर्ण निर्णय से पहले कुछ क्षण रुककर विचार करें।
* दूसरों का अनुकरण करने के बजाय अपने जीवन के उद्देश्य पर ध्यान दें।
* अपनी तुलना दूसरों से नहीं, अपने कल से करें।
* प्रत्येक कार्य को जल्दबाज़ी में नहीं, बल्कि पूरे ध्यान और मनोयोग से करने का अभ्यास करें।
* प्रतिदिन कुछ समय ध्यान, प्राणायाम या शांत बैठने का अभ्यास करें, ताकि मन पर अपना स्वामित्व बना रहे।
धैर्य का अर्थ रुक जाना नहीं, बल्कि सही दिशा में निरंतर चलते रहना है। तेज़ चलना अनुचित नहीं है, किंतु इतनी तेज़ी भी उचित नहीं कि हम अपने भीतर की शांति, संबंधों की ऊष्मा और जीवन का आनंद ही खो दें।
अंततः जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ बाज़ार से नहीं खरीदी जा सकतीं। सुख, शांति, सुकून, प्रेम और संतोष भीतर से उपजते हैं। वे उसी व्यक्ति को प्राप्त होते हैं जो अनुकरण की भीड़ से निकलकर अपने मन का स्वामी बनता है, प्रतिक्रिया के स्थान पर सजग क्रिया को चुनता है और समय-समय पर जीवन की दौड़ में ठहरना भी जानता है। क्योंकि जीवन की सच्ची सफलता केवल शीघ्र मंज़िल तक पहुँचने में नहीं, बल्कि वहाँ पहुँचते-पहुँचते अपने मन की शांति और अपने व्यक्तित्व की गरिमा को सुरक्षित रखने में है।
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