जीवन के साथ भी, मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित

जीवन के साथ भी, मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित

एक प्रेरक मिसाल श्री ईश्वर दयाल सैनी

जिंदगी के साथ और मृत्यु के बाद भी समाज के लिए समर्पित रहने की कहावत को चरितार्थ करने वाले बिरले ही होते हैं। और! वे तो और भी बिरले होते हैं, जो जीवन का अर्थ केवल स्वयं के लिए जीने में नहीं, बल्कि मानव जीवन की सार्थकता को दूसरों के काम आने में समझते हैं।

ऐसी ही एक प्रेरक विभूति थे श्रद्धेय श्री ईश्वर दयाल सैनी जी, जिन्होंने अपने जीवनकाल में समाज, शिक्षा और नई पीढ़ी के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई तथा जीवन के अंतिम पड़ाव पर भी समाज के लिए कुछ छोड़ जाने का निर्णय लिया। उन्होंने मृत्यु से सात वर्ष पूर्व देहदान का संकल्प लेकर यह संदेश दिया कि मनुष्य की उपयोगिता उसके अंतिम सांस के साथ समाप्त नहीं होती।

97 वर्ष की आयु में उनके देहावसान के पश्चात उनके पुत्र श्री आदेश कुमार सैनी एवं पुत्रवधू श्रीमती विजयलता सैनी ने उनके संकल्प का सम्मान करते हुए उनकी देह को एल.एल.आर.एम. मेडिकल कॉलेज, मेरठ के शरीर रचना विज्ञान विभाग को सौंप दिया। इस प्रकार उनका शरीर चिकित्सा शिक्षा और भावी चिकित्सकों के अध्ययन के लिए उपयोगी बनेगा।



यह केवल एक परिवार द्वारा निभाया गया अंतिम संस्कार का अलग रूप नहीं, बल्कि एक जीवित विचार को मृत्यु के बाद भी आगे बढ़ाने का प्रयास है। ईश्वर दयाल सैनी जी की संकल्पबद्धता इस तथ्य से प्रकट होती है कि वे अपने परिवार को प्रतिवर्ष अपने संकल्प की याद दिलाते थे और देहदान का घोषणा पत्र कईं बार अपनी फाइलों से निकलकर आगंतुकों को भी दिखाया करते थे। अपनी मृत्यु से एक हफ्ता पूर्व भी उन्होंने अपने पुत्र एवं पुत्रवधू को अपने संकल्प की याद दिलाई थी। सामान्यतः मृत्यु के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है; देहदान उस शरीर को चिकित्सा-विज्ञान की शिक्षा के लिए समर्पित कर देता है। इससे आने वाली पीढ़ियों के चिकित्सकों को मानव शरीर की वास्तविक संरचना समझने में सहायता मिलती है और अप्रत्यक्ष रूप से असंख्य रोगियों के बेहतर उपचार की संभावना मजबूत होती है।

संकल्प से संस्कार तक

देहदान का वास्तविक महत्व केवल उस क्षण में नहीं है जब देह मेडिकल कॉलेज को सौंपी जाती है। उसकी असली महत्ता उस विचार में है, जो व्यक्ति अपने जीवनकाल में स्वीकार करता है और परिवार उस विचार को अपनी भावनाओं से ऊपर उठकर निभाता है।

ईश्वर दयाल सैनी जी के संदर्भ में यही बात विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उपलब्ध सामग्री में उनके जीवन को शिक्षा, अनुशासन, सामाजिक दायित्व और अध्यात्म से जुड़ा हुआ बताया गया है। उनके परिवार द्वारा उनके देहदान के संकल्प को पूरा करना इस बात का प्रमाण है कि सच्चे संस्कार केवल कहे नहीं जाते, वे कठिन समय में निभाए भी जाते हैं।

ऐसे संकल्पों को समाज तक पहुँचाना, लोगों को देहदान जैसे विषय पर सकारात्मक रूप से सोचने के लिए प्रेरित करना और किसी व्यक्ति के अंतिम सामाजिक योगदान को सम्मानजनक ढंग से सामने लाना—यह स्वयं में एक महत्वपूर्ण सामाजिक सेवा है।

देहदान मृत्यु का अंत नहीं, उपयोगिता का विस्तार है

हमारे समाज में मृत्यु और देहदान को लेकर अनेक संकोच, धारणाएँ और भावनात्मक प्रश्न रहते हैं। इसलिए आवश्यकता किसी पर दबाव डालने की नहीं, बल्कि जागरूकता पैदा करने की है।

ईश्वर दयाल सैनी जी का उदाहरण यह समझाता है कि— मानव शरीर नश्वर है, लेकिन उससे जुड़ी उपयोगिता को आगे बढ़ाया जा सकता है।

एक देह यदि चिकित्सा शिक्षा में काम आती है तो वह अनेक भावी चिकित्सकों की शिक्षा का माध्यम बन सकती है। वे चिकित्सक आगे चलकर हजारों लोगों का उपचार कर सकते हैं। इस दृष्टि से देहदान का प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका लाभ समाज की कई पीढ़ियों तक पहुँच सकता है।

सर्वसमाज के लिए एक बानगी

यह प्रसंग किसी एक जाति, वर्ग, संस्था या परिवार तक सीमित रखने योग्य नहीं है। यह सर्वसमाज के लिए विचार करने योग्य उदाहरण है।

हमें यह विचार करना होगा कि मृत्यु के बाद हमारी देह का क्या होगा, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या हम अपने जाने के बाद भी किसी के काम आ सकते हैं?

ईश्वर दयाल सैनी जी ने अपने जीवन से इसका उत्तर दिया और उनके परिवार ने उनके संकल्प को निभाकर उसे सार्थक कर दिया।

एक विचार, अनेक जीवनों की संभावना

देहदान केवल शरीर दान करना नहीं है। यह अपने जाने के बाद भी ज्ञान की यात्रा को जारी रखना है।

यह उस सोच का नाम है जिसमें मनुष्य कहता है—“मेरे जीवन का अंतिम पड़ाव भी यदि किसी और के भविष्य के निर्माण में काम आ सके, तो इससे बड़ी सार्थकता क्या होगी?”

इसीलिए ईश्वर दयाल सैनी जी का देहदान और उनके परिवारजनों द्वारा उस संकल्प का निर्वहन श्रद्धांजलि से आगे बढ़कर सामाजिक प्रेरणा का विषय है।

और! इस प्रेरक प्रसंग को समाज के सामने लाने में श्री संगीत शर्मा जी की भूमिका भी एक ऐसी पहल के रूप में देखी जानी चाहिए, जो संवेदना को सामाजिक चेतना में और व्यक्तिगत संकल्प को सामूहिक प्रेरणा में बदलने का कार्य करती है।

एक व्यक्ति का संकल्प—

एक परिवार का संस्कार—

और समाज की जागरूकता—

मिलकर देहदान को मानवता के लिए एक महान योगदान बना सकती है।

यही वह सोच है जिसे उलझन सुलझन की भाषा में कहा जा सकता है—

“जीवन मिला है तो जीते जी उपयोगी बनें, और यदि संभव हो तो मृत्यु के बाद भी किसी के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बनें।”

सूचना स्रोत

श्री संगीत शर्मा जी

प्रस्तुति









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