शख्सियत - विजया डालमिया

शख्सियत 

शाम फिर उदास है

नौशाद के शब्दों में गूंजती है तेरी आवाज 

अमीरों के महलों में और गरीबों के झोपड़े में भी हैं तेरे साज

 यूँ तो अपनी मौसिकी पर सबको फक्र होता है मगर

 ऐ मेरे साथी मौसिकी को है आज भी तुझ पर नाज।

गीत हमारी जिंदगी का एक हिस्सा है जो समय समय पर हमारी भावनाओं को व्यक्त करते रहते हैं। यादों के टूटे तार हो या दिल की खुशी, इन कड़ियों को अपनी आवाज से जोड़ने का काम गायक बखूबी करते हैं। इसी परंपरा में एक ऐसा सितारा भी है जिसके लिए सिर्फ यही कहूंगी कि ......"तारीफ करूं क्या उसकी जिसने तुम्हें बनाया".... जी हाँ अपनी आवाज से खास पहचान बनाने वाले, दुनिया से जाने के बाद भी सबके दिलों पर राज कर रहे फनकार का नाम है......" मोहम्मद रफी"

रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर सन 1924 में हुआ।जगह थी अमृतसर जिला और वहाँ पर कोटला सुल्तान मैं किसी ने सोचा भी नहीं था यह बच्चा एक दिन बेहतरीन गायक बन कर उनका नाम रोशन करेगा। उन्हें संगीत की कला फ्री में मिली ।सात साल की उम्र में वे एक फकीर के पीछे- पीछे उनका गाया गाना गुनगुनाते रहते थे ,जिससे उनकी आवाज में निखार आने लगा। गाना था..... "खेडन दे दिन चार माय खेडन दे दिन चार"। हालांकि उनके पिता इसके खिलाफ थे। 1935 में वे लाहौर जाकर रोजी-रोटी के लिए बस गए। वे वहां सलून में जाकर गुनगुनाते रहते थे। बड़े भाई की मदद से उन्होंने संगीत की बाकायदा तालीम ली और सन 1940 में वे मुंबई शहर पहुंच गए ।फिर उनकी मुलाकात नौशाद साहब से हुई और उन्होंने रफी साहब की प्रतिभा पहचान ली।

उनकी आवाज की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे जिस भी किरदार के लिए गीत गाते थे ऐसा लगता था कि उसी की आवाज है। चाहे फिर वह देवानंद हो या दिलीप कुमार। शम्मी कपूर हो या धर्मेंद्र। आवाज की ऐसी खूबसूरती बहुत ही कम गायकों में रही है। जैसे... पहले प्यार की अंगड़ाई का एहसास देता हुआ यह गीत..." दीवाना हुआ बादल" और सनम से मिलने की खुशी में गाता हुआ ये गीत ....."आने से उसके आए बहार"। माशूक की तारीफ का अंदाज देखिए ......"तूने काजल लगाया दिन में रात हो गई" और मौसम को बेईमान ठहराते हुए कि ....."आज मौसम बड़ा बेईमान है "

अगर गीतों की बात हो रही है तो हम बैजू बावरा के उस गीत को कैसे भूल सकते हैं जिसे गाते समय रफी साहब के गले से खून निकल गया था। एक अपराधी को फांसी की सजा देते समय उसकी आखिरी ख्वाहिश में उसने रफी की आवाज में यही गाना......" ए दुनिया के रखवाले ,सुन दर्द भरे मेरे नाले "सुनना चाहा। यह थी रफी की आवाज की कशिश। बैजू बावरा फिल्म के लिए उन्होंने जो भक्ति गीत गाए उसका कोई सानी नहीं है, जिसमें...." मन तडपत हरी दर्शन को आज" भी शामिल है। बैजू बावरा फिल्म के गीत से सबकी जुबां पर छा गए थे रफी साहब ।

फिल्म नीलकमल का गाना ....."बाबुल की दुआएं लेती जा" तो हर लड़की के लिए विदाई गीत बन गया ,जिसे सुनकर शायद ही कोई अपने आँसू रोक पाता होगा। उसकी वजह थी कि रफी की खुद की बेटी की इस गाने के ठीक एक दिन पहले सगाई हुई थी और वे बेहद भावुक थे। इस गीत के लिए उन्हें नेशनल अवार्ड भी मिला।

 अगर एक ही गीत में इजहारे इश्क करना हो तो उसके लिए रफी की आवाज सर्वोत्तम थी। चाहे वह किशोर प्रेम का अल्हडपन हो या दिल टूटने का दर्द ।परिपक्व प्रेम की भावना हो या प्रणय निवेदन। हुस्न की तारीफ में मोहम्मद रफी का कोई सानी नहीं था। प्रेम को छोड़कर और भी जो भावनाएं होती है जैसे.... दुख ,खुशी, आस्था ,भजन, देश -भक्ति ,कव्वाली, लोकगीत, शास्त्रीय संगीत तथा ग़ज़ल ,रफी के तरकश में आवाज के सभी तीर मौजूद थे। आज भी हर शादी में वर का स्वागत उनके गाए गाने..... "बहारौं फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है" से ही किया जाता है ।

एक किस्सा है। 4 फरवरी 1980 को श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में उनका एक शो था। श्रीलंका के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को किसी कार्यक्रम में जाना था, लेकिन रफी के जबरदस्त गायन ने उन्हें रुकने पर मजबूर कर दिया। रफी की एक खासियत थी कि जब वह विदेश के किसी भी शो में जाते थे तो वहाँ की भाषा में एक गीत जरूर सुनाते थे। उस दिन कोलंबो में भी उन्होंने गीत सुनाया, लेकिन जैसे ही उन्होंने हिंदी गाने सुनाने शुरू किए कि भीड़ बेकाबू हो गई ।जबकि वहाँ शायद ही कोई हिंदी समझने वाला था।

 रफी बहुत कम बोलने वाले विनम्र और मीठे इंसान थे। उन्हें पार्टियों में जाने का भी शौक नहीं था। घर पर धोती कुर्ता और रिकॉर्डिंग के समय हमेशा सफेद कमीज व पतलून पहनते थे। वे स्टाइलिश घड़ियों और फैंसी कारों के बेहद शौकीन थे। उन्हें पतंग उड़ाने का भी बेहद शौक था ।जब कभी उनकी पतंग कट जाती थी तो वह बच्चे की तरह मचल जाते थे। 

आपको एक राज की बात बताएं । एक गाने की रिकॉर्डिंग के बाद वे बेहद खुश थे। पूछने पर कहा कि ..."वह जिसके फैन थे आज उन्हें उसके साथ गाने का मौका मिल गया"। वह गाना था नसीब पिक्चर का ......"चल मेरे भाई तेरे हाथ जोड़ता हूँ " इस गाने में दूसरे सिंगर अमिताभ बच्चन थे जिनकी फिल्म दीवार देखने के बाद रफी बिग बी के फैन हो गए थे।

1956 से 1965 तक का समय रफी के कैरियर का सबसे बेहतरीन वक्त था। उन्होंने छह फिल्म फेयर पुरस्कार जीते और बिनाका गीतमाला में दो दशकों तक छाए रहे। एक नेशनल अवार्ड भी रफी के नाम हैं। उन्हें सरकार की तरफ से पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया ।मोहम्मद रफ़ी का आखिरी गीत आसपास फिल्म का..... "शाम फिर क्यों उदास है दोस्त तू कहीं आस पास है दोस्त"था ।

31 जुलाई की रात दिल का दौरा पड़ने से वे सब को अलविदा कह गए। जिस दिन रफी का निधन हुआ उस दिन मुंबई में जोरों की बारिश हो रही थी ।10000 लोग सड़कों पर थे और मनोज कुमार कह उठे कि ....."सुरों की माँ सरस्वती भी आँसू बहा रही है आज"। रफी जिनके आवाज में खुदा की आवाज सुनाई देती है। जो आज के गायकों के भी आईकॉन हैं और आज भी हमारे साथ हैं। कुदरती आवाज में बेहतरीन और यादगार गीत देने वाले रफी साहब के लिए अंत में यही भाव आ रहे हैं कि .....हमारे बाद इस महफिल में अफ़साने बयां होंगे 

बहारें हम को ढूंढ़ेंगी हम न जाने कहाँ होंगे।


रचनाकार

विजया डालमिया 

संपादक मेरी निहारिका और

राष्ट्रीय संयोजिका, उलझन सुलझन

महिला लेखिका प्रकोष्ठ

हैदराबाद (तेलंगाना से) 

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