विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद

विश्व साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मुंशी प्रेमचंद

भूमिका

मुंशी प्रेमचंद केवल हिंदी साहित्य के महान कथाकार नहीं, बल्कि विश्व-यथार्थवादी साहित्य की सशक्त परंपरा के प्रतिनिधि रचनाकार भी हैं। उनका साहित्य भारतीय समाज की पीड़ा, संघर्ष, विषमता और मानवीय संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज़ है। यही कारण है कि उनकी तुलना पाश्चात्य साहित्य के उन महान लेखकों से की जाती है, जिन्होंने अपने-अपने समाज के यथार्थ को साहित्य के माध्यम से अमर बना दिया। विशेष रूप से चार्ल्स डिकेंस और थॉमस हार्डी के साहित्य में प्रेमचंद की रचनात्मक दृष्टि के अनेक समान बिंदु दिखाई देते हैं। प्रस्तुत आलेख इन्हीं तुलनात्मक आयामों को संक्षेप में रेखांकित करता है।


मुंशी प्रेमचंद और पाश्चात्य साहित्य : तुलनात्मक परिप्रेक्ष्य

मुंशी प्रेमचंद और उनके लोक-केंद्रित, यथार्थवादी साहित्य की तुलना मुख्यतः अंग्रेज़ी साहित्य के दो महान कथाकारों—चार्ल्स डिकेंस तथा थॉमस हार्डी—से की जाती है।

1. चार्ल्स डिकेंस

समानता का आधार

जिस प्रकार चार्ल्स डिकेंस ने विक्टोरियन युगीन इंग्लैंड के कारखानों, बाल-श्रम, निर्धनों के शोषण तथा सामाजिक विसंगतियों को अपने उपन्यासों—डेविड कॉपरफील्ड और ऑलिवर ट्विस्ट—का केंद्र बनाया, उसी प्रकार मुंशी प्रेमचंद ने भारतीय समाज की आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विषमताओं का यथार्थ चित्रण किया।

पात्र-विधान और संवेदनशीलता

दोनों ही लेखकों की रचनाओं में समाज के उपेक्षित, शोषित और वंचित वर्ग के पात्रों के प्रति गहरी सहानुभूति और मानवीय करुणा दिखाई देती है। सामाजिक कुरीतियों और अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं पर हास्य तथा व्यंग्य के माध्यम से प्रहार करने की उनकी शैली भी उल्लेखनीय है। यही कारण है कि अनेक साहित्यिक आलोचकों ने प्रेमचंद की सामाजिक दृष्टि और लेखन-शैली को भारतीय संदर्भों में "चार्ल्स डिकेंस के समकक्ष" माना है।

2. थॉमस हार्डी

समानता का आधार

थॉमस हार्डी के उपन्यास—टेस ऑफ़ द ड'अर्बरविल्स तथा द मेयर ऑफ़ कैस्टरब्रिज—ग्रामीण जीवन, किसानों की विवशता, प्रकृति और भाग्य के थपेड़ों से जूझते सामान्य मनुष्य का अत्यंत मार्मिक एवं यथार्थवादी चित्रण प्रस्तुत करते हैं।

किसान जीवन का यथार्थ

मुंशी प्रेमचंद ने भी भारतीय ग्रामीण समाज, महाजनी शोषण, कृषक जीवन की कठिनाइयों तथा सामाजिक विषमताओं को गोदान और कर्मभूमि जैसी कालजयी कृतियों में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। इस दृष्टि से ग्रामीण जीवन, किसान की पीड़ा और सामाजिक यथार्थ के आख्यान में प्रेमचंद और थॉमस हार्डी के बीच गहरा वैचारिक तथा संवेदनात्मक साम्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।



डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
अहमदाबाद, गुजरात


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