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Showing posts from September, 2026

सम्मान से संकल्प तक

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सम्मान से संकल्प तक एक प्रधानाचार्य का चिंतनपूर्ण आत्मकथ्य प्रस्तुति    विचार, शिक्षा एवं जागरूकता के साझा प्रयास के अंतर्गत “शिक्षा का वास्तविक सम्मान तब है, जब उससे किसी विद्यार्थी का जीवन बेहतर बने।” आत्मकथ्य : श्री प्रवेंद्र दहिया , प्रधानाचार्य, होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज, जड़ौदा, मुजफ्फरनगर भूमिका   एक सम्मान, अनेक प्रश्न जीवन में कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जब प्राप्त सम्मान व्यक्ति को प्रसन्नता से अधिक आत्मचिंतन की ओर ले जाते हैं। वे अवसर पूछते हैं कि हमने अब तक क्या किया, क्यों किया और आगे क्या करना शेष है? ‘मंथन-2.0’ में एक्सीलेंस इन स्टूडेंट्स डेवलपिंग अवार्ड से सम्मानित होना मेरे लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति हमारे सामूहिक दायित्व को पुनः समझने का अवसर है। इस सम्मान में मैं अपने विद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और उन सभी सहयोगियों के प्रयासों की झलक देखता हूँ, जो शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर जीवन के विकास से जोड़ने में विश्वास रखते हैं। मेरा मानना है कि प्रधानाचार्य का पद किसी संस्था पर अधिकार रखने क...

दरारों से आती रोशनी

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दरारों से आती रोशनी   दर्द से विवेक और विवेक से मार्गदर्शन तक उलझन सुलझन | चिंतनपरक जागरूकता आलेख भूमिका क्या हर ठोकर अपने साथ कोई सीख लेकर आती है? जीवन में कभी-कभी कोई सहभागी अपने अनुभव को एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त करता है— “जीवन की इतनी ठोकरें खाई हैं कि अब हर कठिनाई में भी उम्मीद और सीख की रोशनी दिखाई देती है।” यह वाक्य केवल पीड़ा का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस दृष्टिकोण का संकेत देता है, जिसमें व्यक्ति कठिनाइयों के बीच भी संभावनाओं को देखना सीखने लगता है। इसी भाव को एक पंक्ति में समझने का प्रयास किया गया— “दर्द ने मुझे इतना सिखा दिया कि अब हर दरार से उजाला दिखाई देता है।” लेकिन यहीं एक और महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—यदि जीवन की दरारों से उजाला दिखाई देने लगे, तो क्या वही उजाला हमें मार्गदर्शन भी प्रदान करता है? उत्तर है—हाँ, वह मार्गदर्शन का माध्यम बन सकता है। किंतु इसके लिए एक आवश्यक अंतर समझना होगा: उजाला दिशा दिखा सकता है, पर उस दिशा को समझना, सही मार्ग चुनना और उस पर चलना मनुष्य के विवेक, साहस और कर्म पर निर्भर करता है। दर्द अपने आप ज्ञान नहीं बन जाता। जब व्यक्ति अपने ...

यह है आत्मविश्वास

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यह है आत्मविश्वास भूमिका कभी-कभी जीवन हमारे सामने ऐसी परिस्थितियाँ रख देता है, जहाँ रास्ते बंद दिखाई देते हैं और कारण इतने मजबूत लगते हैं कि हम प्रयास करने से पहले ही हार मान लेते हैं। लेकिन उसी क्षण भीतर से उठी एक छोटी-सी आवाज यदि कह दे—“एक बार स्वयं प्रयास करके तो देखो”—तो वही आवाज आत्मविश्वास का रूप ले लेती है। यह प्रसंग एक ऐसी किशोरी की कहानी है, जो पढ़ना चाहती थी। प्रवेश को लेकर उसके मन में दुविधा थी, प्रयास हुए, माध्यम बने, उम्मीद बनी और फिर प्रवेश से इनकार भी हुआ। सामान्यतः यहीं कहानी समाप्त हो सकती थी। लेकिन उसने इनकार को अंतिम सत्य मानने के बजाय अपनी संभावनाओं को स्वयं परखने का निर्णय लिया। और शायद यही आत्मविश्वास की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है—परिस्थितियों को स्वीकार करना और उनसे समझौता कर लेना, दोनों एक बात नहीं हैं। आलेख एक पढ़ने को आतुर किशोरी के सामने उच्च शिक्षा में प्रवेश का प्रश्न था। अंतिम तिथि से दो दिन पहले उसने अपनी चिंता एक निकटस्थ व्यक्ति के सामने रखी। बात आगे पहुँची, प्रयास हुए, कुछ लोगों से संपर्क किया गया और उम्मीद बनी कि शायद रास्ता निकल आए। लेकिन अंततः प्रवेश स...

🌷 वह चिट्ठी जो खाली नहीं लौटी

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 🌷 वह चिट्ठी जो खाली नहीं लौटी शहर के एक छोटे-से घर की खिड़की के पास बैठी अनामिका रोज़ शाम बाहर देखा करती थी। सामने बच्चे खेलते, लोग अपने काम से लौटते और सूरज धीरे-धीरे आसमान से उतर जाता। उसकी जिंदगी भी चल रही थी—घर, परिवार, जिम्मेदारियाँ और रोज़मर्रा के काम। सब कुछ था, फिर भी उसके मन में एक सवाल बार-बार उठता— “क्या मेरी अपनी भी कोई पहचान है?” अनामिका को लिखना पसंद था। कभी कविता, कभी कहानी, कभी मन की कोई बात। लेकिन उसकी लिखी हर पंक्ति डायरी के पन्नों तक ही सीमित रह जाती। एक दिन उसने डायरी खोली और लिखा— “मेरे भीतर बहुत कुछ है, लेकिन मैं उसे दुनिया तक कैसे पहुँचाऊँ?” कुछ देर वह उस पन्ने को देखती रही। फिर नीचे लिख दिया— “शायद मैं नहीं कर सकती।” और डायरी बंद कर दी। अगले दिन उसे महिलाओं के एक समूह में एक संदेश मिला— “अगर मन में कोई उलझन है, तो लिखिए। हो सकता है किसी और के अनुभव में आपकी सुलझन छिपी हो।” अनामिका ने बहुत सोचा और बिना अपना नाम बताए अपनी बात लिख दी— “मैं कुछ करना चाहती हूँ, लेकिन लगता है अब बहुत देर हो चुकी है। क्या जिंदगी में दोबारा शुरुआत की जा सकती है?” कुछ ही देर में जव...

वास्तविक घटनायें जो नज़ीर बन गयीं

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एक दिन, दो शुभ संकेत महिला सशक्तिकरण का एक प्राकृतिक और सुखद संयोग 1 सितंबर 2026 उलझन सुलझन परिवार के लिए एक ऐसी तिथि बन गया, जिसे केवल कैलेंडर में दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। इसी दिन डॉ. दीपशिखा खारी ने मुरादाबाद जिला पंचायत कार्यालय में अपना पदभार भी ग्रहण किया और उलझन सुलझन के महिला प्रकोष्ठ की पहल पर स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता के प्रतीक प्रथम अंक का प्रकाशन हुआ। दो अलग घटनाएँ, लेकिन संदेश एक कि महिला को अवसर मिले तो वह जिम्मेदारी भी संभाल सकती है और बदलाव की आवाज़ भी बन सकती है। एक ने दायित्व संभाला, दूसरे ने आवाज़ों को मंच दिया डॉ. दीपशिखा खारी का पदभार ग्रहण किसी पद की औपचारिकता भर नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में महिला नेतृत्व की एक सार्थक उपस्थिति है। पद अपने आप में उपलब्धि है, लेकिन उसे संवेदनशीलता और ईमानदारी से निभाना उससे बड़ी जिम्मेदारी। विशेष अवसर उधर उलझन सुलझन महिला प्रकोष्ठ का प्रथम अंक महिलाओं के विचार, अनुभव और रचनात्मकता को मंच देने की एक छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण शुरुआत है। यही इस दिन की खूबसूरती है— एक महिला ने जिम्मेदारी संभाली, दूसरी महिलाओं की आवाज़ को आगे बढ़ाने ...

सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय संवाद

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सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय  शब्दों में भावों की साधिका हैं ..    राधिका की आराधिका है...       सारिका विजयवर्गीय 'वीणा' शब्दों में भावों की साधना बातचीत प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए। उत्तर:  "जय श्री कृष्ण .. मेरा नाम सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ है। मेरे पति का नाम आनंद जी विजयवर्गीय है और मैं नागपुर, महाराष्ट्र में निवास करती हूँ। मैं स्वयं को सबसे पहले एक गृहलक्ष्मी मानती हूँ। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ मुझे विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने और सीखने का अवसर मिला। पढ़ने को  शौक मुझे बचपन से था और ये शौक  लगाया मुझे मेरे पापा  ने .. वो स्कूल में प्रिंसिपल थे तो लाइब्रेरी में जो भी नई - नई किताबें आती थीं राजा- रानी, वीर  क्रन्तिकारियों की, नैतिक शिक्षा, पंचतंत्र,  चंपक, चंदा मामा, नन्दन, और भी बहुत सारी बाल कहानियाँ जो प्रेरणा भी देती थीं बहुत कुछ सिखाती भी थीं साथ ही कल्पनालोक में विचरण भी करवाती थीं...संवेदनशील हृदय ही कवि की पहचान है बस यहीं से शुरुआत  हुई थी मेरी कवयित्र...

महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा

 महादेवी वर्मा : संवेदना की दीपशिखा आज 11 सितम्बर है। पूरे उन्तालीस बरस हुए महादेवी जी को गए। नीर भरी दुख की बदली के साथ उनमें एक अग्निरेखा भी थी, जो जीवन और साहित्य के बीच में कहीं खिंची हुई थी।  हिंदी साहित्य के आकाश में कुछ ऐसे सितारे हैं, जिनका प्रकाश समय बीतने के साथ कभी धुंधला नहीं पड़ता। महादेवी वर्मा उन्हीं महान साहित्यकारों में से एक हैं।    जहां ख़ुद वह दीपशिखा की तरह निरन्तर जलती रहती थीं। वह मंदिर का दीप ही थीं, जिसे सतत जलते जाना था। वह कहती भी थीं, मधुर मधुर मेरे दीपक जल। उनका प्रिय प्रतीक दिया ही था। बुद्धिसेन शर्मा की यह पंक्तियाँ, वह बहुत बहुत पसंद करती थीं, किसी ने क्या दिया जलते दिये को, दिया बस नाम उसका रख दिया है। वे केवल एक कवयित्री नहीं थीं, बल्कि संवेदना, करुणा, नारी चेतना और मानवीय मूल्यों की सशक्त आवाज थीं। उनकी रचनाओं में मनुष्य के भीतर छिपे भावों को इतनी गहराई से अभिव्यक्ति मिली कि पाठक स्वयं को उनके शब्दों में महसूस करने लगता है। महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च 1907 को फर्रुखाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ था। हिंदी साहित्य के छायावाद युग के चा...

शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण

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शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण एक यादगार आयोजन का आँखों देखा हाल लेखक: डॉ. राकेश राणा 7 सितंबर 2026 का दिन मेरे लिए केवल शिक्षक दिवस का एक औपचारिक अवसर नहीं था, बल्कि साहित्य, संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक ऐसा अनुभव था, जिसे लंबे समय तक स्मृतियों में संजोकर रखा जा सकेगा। प्रातः लगभग 11:30 बजे जब मैं एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के महाविद्यालय सभागार में पहुँचा, तब वहाँ का वातावरण एक सामान्य शैक्षणिक कार्यक्रम से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा था। सभागार में विद्यार्थियों की उत्सुकता, शिक्षकों के प्रति सम्मान और साहित्यिक क्लब के सदस्यों की सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। मंच सुसज्जित था और कार्यक्रम की तैयारी में जुटे विद्यार्थियों के चेहरों पर उत्साह के साथ-साथ जिम्मेदारी का भाव भी झलक रहा था। यह आयोजन एम.एम.एच. कॉलेज के साहित्यिक क्लब द्वारा ‘A Literary Dedication on Teacher’s Day’ शीर्षक से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से व्यक्त करना था। महाविद...

महिला प्रकोष्ठ की पहल पर उलझन सुलझन प्रधान संपादक की विशेष टिप्पणी

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एक अंक नहीं, एक नई शुरुआत… महिला स्वावलंबन से सामाजिक संवाद तक 1 सितंबर 2026 को उलझन सुलझन के महिला प्रकोष्ठ द्वारा महिला स्वावलंबन को समर्पित प्रथम अंक का प्रकाशन हमारे लिए केवल एक प्रकाशन-घटना नहीं है। यह उस विश्वास की शुरुआत है कि जब महिलाओं को अपनी बात कहने, अपनी प्रतिभा दिखाने और अपने अनुभव साझा करने का अवसर मिलता है, तो उसका प्रभाव केवल एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता—वह परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचता है। इस प्रथम प्रयास के बाद प्राप्त एक विचारोत्तेजक प्रतिक्रिया ने हमें रुककर सोचने का अवसर दिया। प्रतिक्रिया में मानव की आंतरिक बेचैनी, शांति की तलाश और ईश्वर की अवधारणा से लेकर आस्था के बाजारवाद में बदल जाने तक के प्रश्न उठाए गए। राष्ट्र, धर्म, संस्कृति और परंपराओं के नाम पर आमजन की भूमिका तथा दूसरी ओर मानवता, समृद्धि और खुशहाली की अधूरी प्रतीक्षा की ओर भी संकेत किया गया। हम इस विचार से सहमत हों या असहमत, लेकिन इतना अवश्य मानते हैं कि प्रश्न उठना और उस प्रश्न पर संवाद होना किसी भी जीवंत समाज के लिए आवश्यक है। इसीलिए यह प्रतिक्रिया हमारे लिए आलोचना मात्र नहीं, बल्कि एक अ...