शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण

शिक्षक दिवस पर साहित्यिक समर्पण

एक यादगार आयोजन का आँखों देखा हाल

लेखक: डॉ. राकेश राणा

7 सितंबर 2026 का दिन मेरे लिए केवल शिक्षक दिवस का एक औपचारिक अवसर नहीं था, बल्कि साहित्य, संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा एक ऐसा अनुभव था, जिसे लंबे समय तक स्मृतियों में संजोकर रखा जा सकेगा।

प्रातः लगभग 11:30 बजे जब मैं एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के महाविद्यालय सभागार में पहुँचा, तब वहाँ का वातावरण एक सामान्य शैक्षणिक कार्यक्रम से बिल्कुल अलग दिखाई दे रहा था। सभागार में विद्यार्थियों की उत्सुकता, शिक्षकों के प्रति सम्मान और साहित्यिक क्लब के सदस्यों की सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही थी। मंच सुसज्जित था और कार्यक्रम की तैयारी में जुटे विद्यार्थियों के चेहरों पर उत्साह के साथ-साथ जिम्मेदारी का भाव भी झलक रहा था।

यह आयोजन एम.एम.एच. कॉलेज के साहित्यिक क्लब द्वारा ‘A Literary Dedication on Teacher’s Day’ शीर्षक से आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का उद्देश्य शिक्षकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह को साहित्यिक एवं सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से व्यक्त करना था। महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. संजय कुमार सिंह, डीन प्रो. प्रकाश चौधरी, साहित्यिक क्लब की संयोजक प्रो. सुरेखा अहलावत, पूर्व पदाधिकारी, वर्तमान सदस्य और विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को विशेष गरिमा प्रदान की।

सरस्वती वंदना से हुआ शुभारंभ

कार्यक्रम का कुशल संचालन साक्षी द्वारा किया जा रहा था। मंच से जैसे ही सरस्वती वंदना की घोषणा हुई, सभागार का वातावरण स्वतः ही गंभीर और आध्यात्मिक हो गया। श्वेता बसोया, राधा और अदिति चौहान ने अपनी सहभागिता से कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

सरस्वती वंदना के पश्चात प्रथम वर्ष की छात्रा खुशी शर्मा ने शिक्षकों के महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उनके संबोधन में एक विद्यार्थी की सहज भावनाएँ थीं—शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने वाले व्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन की दिशा निर्धारित करने वाले मार्गदर्शक होते हैं। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि विद्यार्थी के व्यक्तित्व निर्माण में शिक्षक की भूमिका कितनी गहरी और स्थायी होती है।

इसके बाद विश्वानी शर्मा और अदिति चौहान ने अपनी कविताओं के माध्यम से शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की। उनकी कविताओं में भावुकता भी थी और वह सच्चाई भी, जो किसी विद्यार्थी के हृदय में अपने शिक्षक के प्रति स्वाभाविक रूप से होती है।

नाटक ने बाँधा सबका मन

कार्यक्रम का सबसे प्रभावशाली और विशेष आकर्षण विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत शिक्षकों को समर्पित नाटक था। विभिन्न पाठ्यक्रमों और संकायों के विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से इस प्रस्तुति में भाग लिया।

अनुष्का गौतम, इकरा, प्रतिभा गर्ग, तनिष्का तोमर, सरिता, रोहिणी, यशस्वी, विशाखा, तूलिका, पुष्पराज तिवारी, आशीष यादव, सिमरन, रागिनी और कृष्णा ने अपने अभिनय से यह सिद्ध कर दिया कि महाविद्यालयीन जीवन केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं है। जब विद्यार्थियों को अवसर मिलता है, तो वे अपनी रचनात्मकता, संवेदनशीलता और सामूहिक क्षमता का सुंदर प्रदर्शन कर सकते हैं।

नाटक का निर्देशन श्वेता बसोया, वंश सहरावत, अदिति चौहान, रमेश, हर्ष, तूलिका और प्रतिभा ने किया। निर्देशन टीम के सामूहिक प्रयास ने प्रस्तुति को प्रभावशाली बनाया। नाटक में शिक्षकों के प्रति सम्मान, स्नेह और कृतज्ञता को जिस भावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया, उससे सभागार में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को उस भाव से जुड़ा हुआ अनुभव कर रहा था।

मेरी दृष्टि में यह प्रस्तुति केवल अभिनय नहीं थी; यह विद्यार्थियों की ओर से अपने शिक्षकों को दिया गया एक जीवंत साहित्यिक और भावनात्मक समर्पण था।

साहित्य और संगीत का सुंदर संगम

नाटक के बाद कार्यक्रम में साहित्यिक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का क्रम जारी रहा। मोहम्मद अकरम ने “Letter to a Teacher” के माध्यम से शिक्षक के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की। यह प्रस्तुति सरल होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली थी, क्योंकि शिक्षक के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए भाषा से अधिक भावना की आवश्यकता होती है।

सूर्य प्रकाश सिंह ने काव्यात्मक प्रस्तुति के माध्यम से शिक्षकों को साहित्यिक श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके पश्चात आदिल ने रैप गीत प्रस्तुत किया, जिसने कार्यक्रम में युवा ऊर्जा का संचार किया। आदिल और उज्ज्वल की युगल गीत प्रस्तुति ने सभागार में सांगीतिक वातावरण निर्मित कर दिया।

इन प्रस्तुतियों ने यह स्पष्ट किया कि साहित्य और संस्कृति केवल गंभीर चिंतन के माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे विभिन्न पीढ़ियों और अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों को जोड़ने का कार्य भी करते हैं।

पूर्व पदाधिकारियों की स्मृतियों ने जगाई पुरानी यादें

कार्यक्रम का एक अत्यंत भावपूर्ण चरण साहित्यिक क्लब के पूर्व पदाधिकारियों का सम्मान एवं अनुभव-साझाकरण था।

साहित्यिक क्लब के पूर्व पदाधिकारियों को जब मंच पर आमंत्रित किया गया, तो ऐसा लगा जैसे महाविद्यालय की साहित्यिक यात्रा के पुराने पन्ने एक-एक करके खुल रहे हों। सुधा, अनिकेत, पवन शर्मा, श्वेता बसोया और हर्ष ने क्लब के साथ अपने अनुभव साझा किए।

उनके वक्तव्यों में केवल अतीत की स्मृतियाँ नहीं थीं, बल्कि एक संस्था के निर्माण, उसके विकास और उससे जुड़े भावनात्मक संबंधों की झलक भी थी। उन्होंने बताया कि किसी भी क्लब या संस्था की वास्तविक शक्ति केवल उसके पदों में नहीं, बल्कि उससे जुड़े लोगों की निष्ठा, सहभागिता और निरंतरता में होती है।

इन पूर्व पदाधिकारियों के अनुभव वर्तमान सदस्यों के लिए निश्चित रूप से प्रेरणादायक रहे होंगे। परंपरा और नवाचार का यह सुंदर मेल साहित्यिक क्लब की जीवंतता को दर्शाता है।

प्रो. सुरेखा अहलावत का मार्गदर्शन

इसके पश्चात साहित्यिक क्लब की संयोजक प्रो. सुरेखा अहलावत को संबोधन के लिए आमंत्रित किया गया।

उनका व्यक्तित्व और संबोधन दोनों ही कार्यक्रम की गरिमा के अनुरूप थे। उन्होंने विद्यार्थियों को साहित्य के महत्व, अनुशासन की आवश्यकता और शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों की पवित्रता के प्रति सजग किया। उनका मार्गदर्शन केवल औपचारिक संबोधन नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों के लिए एक दिशा-सूचक संदेश था।

साहित्य मनुष्य को संवेदनशील बनाता है और अनुशासन उसे अपने लक्ष्य तक पहुँचने की क्षमता देता है—उनके विचारों में यह भाव स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।

डीन प्रो. प्रकाश चौधरी का प्रेरणादायक संदेश

कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए महाविद्यालय के डीन प्रो. प्रकाश चौधरी ने विद्यार्थियों को संबोधित किया। उनके संबोधन में जिम्मेदारी, अनुशासन और निरंतर सीखने की भावना पर विशेष बल दिया गया।

उन्होंने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा उत्तीर्ण करना नहीं, बल्कि जीवन को समझना और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पहचानना भी है।

उनके विचारों ने सभागार में उपस्थित विद्यार्थियों को आत्ममंथन का अवसर दिया। शिक्षा तब सार्थक होती है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार और दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन लाती है।

प्राचार्य प्रो. संजय कुमार सिंह का विशेष उद्बोधन

कार्यक्रम का अंतिम और विशेष संबोधन महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. संजय कुमार सिंह द्वारा दिया गया।

उनके संबोधन में शिक्षक दिवस की मूल भावना स्पष्ट रूप से दिखाई दी। उन्होंने विद्यार्थियों को अनुशासन, ज्ञान और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने शिक्षकों के महत्व तथा विद्यार्थियों के जीवन में उनके मार्गदर्शन की भूमिका पर प्रकाश डाला।

प्राचार्य जी का संबोधन केवल विद्यार्थियों के लिए नहीं, बल्कि उपस्थित सभी लोगों के लिए एक प्रेरक संदेश था। उन्होंने यह भाव स्थापित किया कि शिक्षक समाज के भविष्य का निर्माण करते हैं और विद्यार्थी उस निर्माण प्रक्रिया की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं।

उनके विचारों में ज्ञान का प्रकाश भी था और जीवन के प्रति जिम्मेदारी का आह्वान भी।

प्रतिभाओं का सम्मान

इसके पश्चात सत्र 2025–2026 के विभिन्न विजेताओं के लिए सम्मान समारोह आयोजित किया गया। डॉ. स्वर्णाली डे द्वारा आयोजित इस चरण में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. संजय कुमार सिंह एवं डीन प्रो. प्रकाश चौधरी ने विजेताओं को प्रमाण-पत्र प्रदान किए।

यह क्षण विद्यार्थियों के लिए विशेष उत्साह और गौरव का था। किसी भी प्रतिभा को सार्वजनिक रूप से पहचान मिलना उस विद्यार्थी के आत्मविश्वास को बढ़ाता है और भविष्य में बेहतर करने की प्रेरणा देता है।

साहित्यिक क्लब के पूर्व पदाधिकारियों को भी उनके योगदान और सेवाओं के लिए प्रशंसा-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि उस सामूहिक परंपरा का भी सम्मान था, जिसने साहित्यिक क्लब को निरंतर सक्रिय बनाए रखने में योगदान दिया।

स्वयंसेवकों की अदृश्य लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका

किसी भी सफल कार्यक्रम के पीछे मंच पर दिखाई देने वाले चेहरों के साथ-साथ अनेक ऐसे हाथ होते हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर पूरी व्यवस्था को संभालते हैं। इस कार्यक्रम में साहित्यिक क्लब के स्वयंसेवकों की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय रही।

स्वागत एवं तिलक की जिम्मेदारी सुधा सिंह, मेहक, तुमुल चौहान और सूर्य प्रकाश सिंह ने संभाली। सरस्वती वंदना में श्वेता बसोया, राधा और अदिति चौहान ने सहभागिता की।

PPT एवं माइक संचालन का दायित्व हर्ष शर्मा और पवन शर्मा ने निभाया। कार्यक्रम के संचालन और समन्वय में साक्षी का योगदान महत्वपूर्ण रहा।

रोहिणी त्यागी, विशाखा और निकिता ने विभिन्न व्यवस्थागत कार्यों में सहयोग किया। हर्षित ने छात्र उपस्थिति की जिम्मेदारी संभाली, जबकि नीतू वर्मा, आंचल सुनील, अजय, तरुण तेवतिया और रमेश ने अनुशासन व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इन सभी स्वयंसेवकों का सामूहिक योगदान यह बताता है कि किसी कार्यक्रम की सफलता केवल मंच पर होने वाली प्रस्तुतियों से नहीं, बल्कि पूरी टीम की जिम्मेदारी और सहयोग की भावना से सुनिश्चित होती है।

स्मृतियों में संजोया गया एक अवसर

कार्यक्रम के समापन से पूर्व सभी प्रतिभागियों, पदाधिकारियों और अतिथियों के साथ समूह-चित्र लिया गया। उस क्षण में पूरे आयोजन की ऊर्जा, प्रसन्नता और संतोष एक साथ दिखाई दे रहा था।

अंततः “वंदे मातरम्” की सामूहिक प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का गरिमापूर्ण समापन हुआ।

जब मैं सभागार से बाहर निकला, तो मेरे मन में यह विचार स्पष्ट था कि यह आयोजन केवल शिक्षक दिवस मनाने का एक कार्यक्रम नहीं था। यह शिक्षकों के प्रति सम्मान की साहित्यिक अभिव्यक्ति, विद्यार्थियों की रचनात्मक प्रतिभा का उत्सव और गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा का जीवंत उदाहरण था।

निष्कर्ष

एम.एम.एच. कॉलेज, गाज़ियाबाद के साहित्यिक क्लब द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का प्रमाण है कि शिक्षण संस्थान केवल डिग्री प्रदान करने के केंद्र नहीं होते, बल्कि वे व्यक्तित्व निर्माण, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं।

इस आयोजन ने विद्यार्थियों को अपनी प्रतिभा अभिव्यक्त करने का अवसर दिया, पूर्व पदाधिकारियों को अपनी स्मृतियाँ साझा करने का मंच प्रदान किया और शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना को नई पीढ़ी के बीच सुदृढ़ किया।

एक प्रत्यक्षदर्शी के रूप में मेरा अनुभव यही कहता है कि जब साहित्य, शिक्षा और संस्कार एक मंच पर एकत्र होते हैं, तो कार्यक्रम केवल कार्यक्रम नहीं रह जाता—वह एक ऐसी स्मृति बन जाता है, जो समय बीतने के बाद भी मन में अपनी उपस्थिति बनाए रखती है।

शिक्षक दिवस पर आयोजित यह साहित्यिक समर्पण वास्तव में ज्ञान के उन दीपों के प्रति विद्यार्थियों की विनम्र श्रद्धांजलि थी, जो स्वयं जलकर दूसरों के जीवन में प्रकाश फैलाते हैं।

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