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Showing posts from April, 2026

🌼 संकल्पना से साकार तक 🌼

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🌼 संकल्पना से साकार तक 🌼 हस्तिनापुर साहित्य उत्सव 2026 (निदेशक आदर्श कुमार की दृष्टि का सजीव रूप ) कभी-कभी एक छोटी-सी कल्पना, समय की सीमाओं को तोड़कर एक विराट स्वरूप ले लेती है। ऐसा ही कुछ हुआ, जब सेवानिवृत्त निदेशक आदर्श कुमार ने अपनी कृति अनुभूति को मात्र चार दिनों में मूर्त रूप देने का संकल्प लिया। यह केवल एक पुस्तक के प्रकाशन की योजना भर नहीं थी— यह एक भाव था… एक दृष्टि थी… एक ऐसा बीज, जिसमें साहित्य, संस्कृति और समाज को एक मंच पर लाने का स्वप्न छिपा हुआ था। 🌿और यहीं से आरम्भ हुआ🌿 हस्तिनापुर साहित्य उत्सव 2026 का विराट विचार और उनको मिली प्रशस्ति   आदर्श कुमार की कल्पना में यह उत्सव केवल कार्यक्रम नहीं था, बल्कि— * हस्तिनापुर की ऐतिहासिक चेतना को पुनर्जीवित करने का प्रयास, * साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने का माध्यम, * और आत्मबोध से विश्वबोध की विचारधारा को व्यवहार में उतारने का मंच। इसी संकल्प को साकार करने के लिए, बहसूमा रियासत के ऐतिहासिक परिवेश में, ग्राम हँसापुर को चुना गया—जहाँ इतिहास स्वयं साक्षी बन सके। और फिर… जिसे एक विचार के रूप में देखा गया था, वह धीरे-धीरे एक वृह...

किसानों की चिंता

किसानों की चिंता प्रकृति, परिश्रम और पीड़ा का संवेदनात्मक दस्तावेज़ भूमिका भारतीय कृषक केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के बीच जीवंत सेतु है। उसकी हर सांस ऋतुचक्र के साथ चलती है और हर आशा बादलों की चाल पर निर्भर करती है। ऐसे में जब प्रकृति अपने स्वभाव से विचलित होकर बे-मौसम बारिश का रूप ले लेती है, तो वह केवल जल नहीं बरसाती—वह किसानों के सपनों, श्रम और जीवन-संतुलन को भी बहा ले जाती है। कवि मुकेश कुमावत मंगल की कविता “किसानों की चिंता” इसी त्रासदी का मार्मिक चित्रण है। यह कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि उस किसान की मूक व्यथा है, जो अपनी आंखों के सामने अपनी मेहनत को मिट्टी में सड़ते हुए देखता है। इसमें खरीफ और रबी दोनों फसलों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव , आर्थिक असंतुलन , सामाजिक विषमता और मानसिक पीड़ा का अत्यंत संवेदनशील वर्णन किया गया है। कवि ने बड़ी सहजता से यह दिखाया है कि कैसे एक ओर बीज सड़ जाते हैं, तो दूसरी ओर भविष्य की योजनाएँ भी ध्वस्त हो जाती हैं। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, पशुओं का पालन—सब कुछ एक साथ संकट में आ खड़ा होता है। छोटे किसान, जो पहले ही सीमित स...

डॉ अशोक कुमार चौधरी का आत्मकथ्य

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एक आत्मकथ्य   एक आत्मीय क्षण, एक ऐतिहासिक अनुभूति उस दिन मेरे लिए केवल एक औपचारिक अवसर नहीं था, बल्कि यह मेरे जीवन के उन विरल क्षणों में से एक था, जहाँ श्रम, संवेदना और संस्कार—तीनों एक साथ साकार होते प्रतीत हुए। जब मैंने अपनी स्वरचित पुस्तक संघ के आदरणीय सह सरकार्यवाह श्री कृष्ण गोपाल जी को भेंट की, तो वह क्षण केवल पुस्तक सौंपने का नहीं, बल्कि अपने विचारों, अपनी साधना और अपने अंतर्मन को समर्पित करने का था। मेरे साथ उस समय धनौरा के डॉ. यतेंद्र कटारिया जी और सेवानिवृत्त एसपी श्री रमेश गुर्जर जी की उपस्थिति ने उस क्षण को और भी गरिमा प्रदान की। हम सभी के चेहरों पर एक संतोष था—मानो हम किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक उत्तरदायित्व के सहभागी हों। जब मैंने अपनी पुस्तक उनके हाथों में सौंपी, तो मन में एक सहज प्रश्न भी उठा—क्या मेरे शब्द उस परंपरा के अनुरूप हैं, जिसे हम जीने का प्रयास करते हैं? परन्तु उनके स्नेहिल भावों ने यह आश्वस्त किया कि प्रयास ही सबसे बड़ी साधना है। इस पूरी यात्रा का एक और भावुक आयाम तब सामने आया, जब मैं मेरठ साउथ के नमो भारत स्टेशन पर उतरा। मेट्...