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समझें कथन शिकायत है या कि चुगली

समझें शिकायत और चुगली के मध्य का अंतर बहुत से लोग शिकायत और चुगली को एक ही समझ लेते हैं, जबकि दोनों की भावना, उद्देश्य और परिणाम बिल्कुल भिन्न होते हैं। शिकायत न्याय, सुधार और समाधान की भावना से की जाती है। जब किसी गलती, अन्याय, अनुचित व्यवहार या समस्या को उचित व्यक्ति के समक्ष इसलिए रखा जाए कि उसका समाधान हो सके, तो वह शिकायत कहलाती है। चुगली किसी व्यक्ति की छवि खराब करने, संबंध बिगाड़ने, ईर्ष्या निकालने या मनोरंजन के लिए की जाती है। जब किसी की बातों या कमियों को इधर-उधर इस उद्देश्य से फैलाया जाए कि उसकी प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचे, तो वह चुगली कहलाती है। सरल शब्दों में शिकायत का उद्देश्य – समस्या का समाधान। चुगली का उद्देश्य – व्यक्ति का अवमूल्यन या संबंधों में दरार। शिकायत उचित स्थान पर की जाती है। चुगली हर स्थान पर की जाती है। शिकायत व्यवस्था को सुधारती है। चुगली वातावरण को बिगाड़ती है। शिकायत में जिम्मेदारी होती है। चुगली में अक्सर जिम्मेदारी का अभाव होता है। यदि किसी बात को सुनकर समस्या हल होती है, तो वह शिकायत है; और यदि किसी बात को सुनकर केवल मनों में दूरी बढ़ती है, तो वह चुगली ह...

सम्मान से संकल्प तक

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सम्मान से संकल्प तक एक प्रधानाचार्य का चिंतनपूर्ण आत्मकथ्य प्रस्तुति    विचार, शिक्षा एवं जागरूकता के साझा प्रयास के अंतर्गत “शिक्षा का वास्तविक सम्मान तब है, जब उससे किसी विद्यार्थी का जीवन बेहतर बने।” आत्मकथ्य : श्री प्रवेंद्र दहिया , प्रधानाचार्य, होली चाइल्ड पब्लिक इंटर कॉलेज, जड़ौदा, मुजफ्फरनगर भूमिका   एक सम्मान, अनेक प्रश्न जीवन में कुछ अवसर ऐसे आते हैं, जब प्राप्त सम्मान व्यक्ति को प्रसन्नता से अधिक आत्मचिंतन की ओर ले जाते हैं। वे अवसर पूछते हैं कि हमने अब तक क्या किया, क्यों किया और आगे क्या करना शेष है? ‘मंथन-2.0’ में एक्सीलेंस इन स्टूडेंट्स डेवलपिंग अवार्ड से सम्मानित होना मेरे लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का विषय नहीं, बल्कि शिक्षा के प्रति हमारे सामूहिक दायित्व को पुनः समझने का अवसर है। इस सम्मान में मैं अपने विद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों, अभिभावकों और उन सभी सहयोगियों के प्रयासों की झलक देखता हूँ, जो शिक्षा को केवल पाठ्यपुस्तकों तक सीमित न रखकर जीवन के विकास से जोड़ने में विश्वास रखते हैं। मेरा मानना है कि प्रधानाचार्य का पद किसी संस्था पर अधिकार रखने क...

दरारों से आती रोशनी

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दरारों से आती रोशनी   दर्द से विवेक और विवेक से मार्गदर्शन तक उलझन सुलझन | चिंतनपरक जागरूकता आलेख भूमिका क्या हर ठोकर अपने साथ कोई सीख लेकर आती है? जीवन में कभी-कभी कोई सहभागी अपने अनुभव को एक वाक्य में इस प्रकार व्यक्त करता है— “जीवन की इतनी ठोकरें खाई हैं कि अब हर कठिनाई में भी उम्मीद और सीख की रोशनी दिखाई देती है।” यह वाक्य केवल पीड़ा का वर्णन नहीं करता, बल्कि उस दृष्टिकोण का संकेत देता है, जिसमें व्यक्ति कठिनाइयों के बीच भी संभावनाओं को देखना सीखने लगता है। इसी भाव को एक पंक्ति में समझने का प्रयास किया गया— “दर्द ने मुझे इतना सिखा दिया कि अब हर दरार से उजाला दिखाई देता है।” लेकिन यहीं एक और महत्वपूर्ण प्रश्न जन्म लेता है—यदि जीवन की दरारों से उजाला दिखाई देने लगे, तो क्या वही उजाला हमें मार्गदर्शन भी प्रदान करता है? उत्तर है—हाँ, वह मार्गदर्शन का माध्यम बन सकता है। किंतु इसके लिए एक आवश्यक अंतर समझना होगा: उजाला दिशा दिखा सकता है, पर उस दिशा को समझना, सही मार्ग चुनना और उस पर चलना मनुष्य के विवेक, साहस और कर्म पर निर्भर करता है। दर्द अपने आप ज्ञान नहीं बन जाता। जब व्यक्ति अपने ...

यह है आत्मविश्वास

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यह है आत्मविश्वास भूमिका कभी-कभी जीवन हमारे सामने ऐसी परिस्थितियाँ रख देता है, जहाँ रास्ते बंद दिखाई देते हैं और कारण इतने मजबूत लगते हैं कि हम प्रयास करने से पहले ही हार मान लेते हैं। लेकिन उसी क्षण भीतर से उठी एक छोटी-सी आवाज यदि कह दे—“एक बार स्वयं प्रयास करके तो देखो”—तो वही आवाज आत्मविश्वास का रूप ले लेती है। यह प्रसंग एक ऐसी किशोरी की कहानी है, जो पढ़ना चाहती थी। प्रवेश को लेकर उसके मन में दुविधा थी, प्रयास हुए, माध्यम बने, उम्मीद बनी और फिर प्रवेश से इनकार भी हुआ। सामान्यतः यहीं कहानी समाप्त हो सकती थी। लेकिन उसने इनकार को अंतिम सत्य मानने के बजाय अपनी संभावनाओं को स्वयं परखने का निर्णय लिया। और शायद यही आत्मविश्वास की सबसे महत्वपूर्ण पहचान है—परिस्थितियों को स्वीकार करना और उनसे समझौता कर लेना, दोनों एक बात नहीं हैं। आलेख एक पढ़ने को आतुर किशोरी के सामने उच्च शिक्षा में प्रवेश का प्रश्न था। अंतिम तिथि से दो दिन पहले उसने अपनी चिंता एक निकटस्थ व्यक्ति के सामने रखी। बात आगे पहुँची, प्रयास हुए, कुछ लोगों से संपर्क किया गया और उम्मीद बनी कि शायद रास्ता निकल आए। लेकिन अंततः प्रवेश स...

🌷 वह चिट्ठी जो खाली नहीं लौटी

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 🌷 वह चिट्ठी जो खाली नहीं लौटी शहर के एक छोटे-से घर की खिड़की के पास बैठी अनामिका रोज़ शाम बाहर देखा करती थी। सामने बच्चे खेलते, लोग अपने काम से लौटते और सूरज धीरे-धीरे आसमान से उतर जाता। उसकी जिंदगी भी चल रही थी—घर, परिवार, जिम्मेदारियाँ और रोज़मर्रा के काम। सब कुछ था, फिर भी उसके मन में एक सवाल बार-बार उठता— “क्या मेरी अपनी भी कोई पहचान है?” अनामिका को लिखना पसंद था। कभी कविता, कभी कहानी, कभी मन की कोई बात। लेकिन उसकी लिखी हर पंक्ति डायरी के पन्नों तक ही सीमित रह जाती। एक दिन उसने डायरी खोली और लिखा— “मेरे भीतर बहुत कुछ है, लेकिन मैं उसे दुनिया तक कैसे पहुँचाऊँ?” कुछ देर वह उस पन्ने को देखती रही। फिर नीचे लिख दिया— “शायद मैं नहीं कर सकती।” और डायरी बंद कर दी। अगले दिन उसे महिलाओं के एक समूह में एक संदेश मिला— “अगर मन में कोई उलझन है, तो लिखिए। हो सकता है किसी और के अनुभव में आपकी सुलझन छिपी हो।” अनामिका ने बहुत सोचा और बिना अपना नाम बताए अपनी बात लिख दी— “मैं कुछ करना चाहती हूँ, लेकिन लगता है अब बहुत देर हो चुकी है। क्या जिंदगी में दोबारा शुरुआत की जा सकती है?” कुछ ही देर में जव...

वास्तविक घटनायें जो नज़ीर बन गयीं

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एक दिन, दो शुभ संकेत महिला सशक्तिकरण का एक प्राकृतिक और सुखद संयोग 1 सितंबर 2026 उलझन सुलझन परिवार के लिए एक ऐसी तिथि बन गया, जिसे केवल कैलेंडर में दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। इसी दिन डॉ. दीपशिखा खारी ने मुरादाबाद जिला पंचायत कार्यालय में अपना पदभार भी ग्रहण किया और उलझन सुलझन के महिला प्रकोष्ठ की पहल पर स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता के प्रतीक प्रथम अंक का प्रकाशन हुआ। दो अलग घटनाएँ, लेकिन संदेश एक कि महिला को अवसर मिले तो वह जिम्मेदारी भी संभाल सकती है और बदलाव की आवाज़ भी बन सकती है। एक ने दायित्व संभाला, दूसरे ने आवाज़ों को मंच दिया डॉ. दीपशिखा खारी का पदभार ग्रहण किसी पद की औपचारिकता भर नहीं, बल्कि सार्वजनिक जीवन में महिला नेतृत्व की एक सार्थक उपस्थिति है। पद अपने आप में उपलब्धि है, लेकिन उसे संवेदनशीलता और ईमानदारी से निभाना उससे बड़ी जिम्मेदारी। विशेष अवसर उधर उलझन सुलझन महिला प्रकोष्ठ का प्रथम अंक महिलाओं के विचार, अनुभव और रचनात्मकता को मंच देने की एक छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण शुरुआत है। यही इस दिन की खूबसूरती है— एक महिला ने जिम्मेदारी संभाली, दूसरी महिलाओं की आवाज़ को आगे बढ़ाने ...

सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय संवाद

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सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय  शब्दों में भावों की साधिका हैं ..    राधिका की आराधिका है...       सारिका विजयवर्गीय 'वीणा' शब्दों में भावों की साधना बातचीत प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए। उत्तर:  "जय श्री कृष्ण .. मेरा नाम सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ है। मेरे पति का नाम आनंद जी विजयवर्गीय है और मैं नागपुर, महाराष्ट्र में निवास करती हूँ। मैं स्वयं को सबसे पहले एक गृहलक्ष्मी मानती हूँ। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ मुझे विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने और सीखने का अवसर मिला। पढ़ने को  शौक मुझे बचपन से था और ये शौक  लगाया मुझे मेरे पापा  ने .. वो स्कूल में प्रिंसिपल थे तो लाइब्रेरी में जो भी नई - नई किताबें आती थीं राजा- रानी, वीर  क्रन्तिकारियों की, नैतिक शिक्षा, पंचतंत्र,  चंपक, चंदा मामा, नन्दन, और भी बहुत सारी बाल कहानियाँ जो प्रेरणा भी देती थीं बहुत कुछ सिखाती भी थीं साथ ही कल्पनालोक में विचरण भी करवाती थीं...संवेदनशील हृदय ही कवि की पहचान है बस यहीं से शुरुआत  हुई थी मेरी कवयित्र...