अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता
अधीरता का बढ़ता संसार और ठहराव की आवश्यकता किसी ने कहा है— "जीवन की हर मंज़िल तेज़ रफ़्तार से नहीं मिलती। कुछ अनमोल चीज़ें ठहरकर ही मिलती हैं, जैसे सुख, शांति और सुकून।" यह बात लगभग हर व्यक्ति जानता है। हम बच्चों को भी यही सिखाते हैं कि धैर्य रखो, समय का सम्मान करो और जल्दबाज़ी से बचो। फिर भी आज जीवन के लगभग हर क्षेत्र—परिवार, शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति, समाज और व्यक्तिगत संबंधों—में अधीरता स्पष्ट दिखाई देती है। प्रश्न यह है कि जब सत्य सबको ज्ञात है, तो व्यवहार उससे इतना दूर क्यों होता जा रहा है? यदि इस प्रश्न की जड़ तक पहुँचा जाए तो एक महत्त्वपूर्ण कारण सामने आता है—अनुकरण की प्रवृत्ति। आज अधिकांश लोग अपने जीवन को अपने विवेक से कम और दूसरों को देखकर अधिक जी रहे हैं। किसी को आगे बढ़ते देखकर हमें भी उसी गति से आगे बढ़ना है; किसी को सफलता मिलती दिखाई देती है तो उसी क्षण वैसी ही सफलता हमें भी चाहिए। इस प्रकार जीवन का संचालन क्रिया से नहीं, प्रतिक्रिया से होने लगता है। जब हमारा जीवन दूसरों की गति, उपलब्धियों और अपेक्षाओं की प्रतिक्रिया बन जाता है, तब अधीरता स्वाभाविक रूप से जन्म ले...