किसानों की चिंता
किसानों की चिंता
प्रकृति, परिश्रम और पीड़ा का संवेदनात्मक दस्तावेज़
भूमिका
भारतीय कृषक केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के बीच जीवंत सेतु है। उसकी हर सांस ऋतुचक्र के साथ चलती है और हर आशा बादलों की चाल पर निर्भर करती है। ऐसे में जब प्रकृति अपने स्वभाव से विचलित होकर बे-मौसम बारिश का रूप ले लेती है, तो वह केवल जल नहीं बरसाती—वह किसानों के सपनों, श्रम और जीवन-संतुलन को भी बहा ले जाती है।
कवि मुकेश कुमावत मंगल की कविता “किसानों की चिंता” इसी त्रासदी का मार्मिक चित्रण है। यह कविता केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि उस किसान की मूक व्यथा है, जो अपनी आंखों के सामने अपनी मेहनत को मिट्टी में सड़ते हुए देखता है। इसमें खरीफ और रबी दोनों फसलों पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव, आर्थिक असंतुलन, सामाजिक विषमता और मानसिक पीड़ा का अत्यंत संवेदनशील वर्णन किया गया है।
कवि ने बड़ी सहजता से यह दिखाया है कि कैसे एक ओर बीज सड़ जाते हैं, तो दूसरी ओर भविष्य की योजनाएँ भी ध्वस्त हो जाती हैं। बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च, पशुओं का पालन—सब कुछ एक साथ संकट में आ खड़ा होता है। छोटे किसान, जो पहले ही सीमित संसाधनों में जीवन यापन करते हैं, उनके लिए यह स्थिति और भी विकट हो जाती है। वहीं मुआवजे की असमानता सामाजिक संरचना के भीतर छिपे असंतुलन को उजागर करती है।
यह कविता केवल दुःख का वर्णन नहीं करती, बल्कि एक प्रश्न भी खड़ा करती है—क्या प्रकृति का यह असंतुलन ही कारण है, या हमारी व्यवस्थाओं में भी कहीं कमी है? अंत में कवि का भगवान से संवाद, एक प्रार्थना के रूप में उभरता है, जिसमें आशा और निराशा दोनों का संगम दिखाई देता है।
विश्लेषण
संवेदना से व्यवस्था तक
इस काव्य में निम्न प्रमुख बिंदु उभरकर सामने आते हैं—
प्राकृतिक असंतुलन का प्रभाव
बे-मौसम बारिश ने खेती के पारंपरिक चक्र को बाधित कर दिया है, जिससे बीज सड़ने और फसल नष्ट होने की समस्या उत्पन्न होती है।आर्थिक संकट और असुरक्षा
बार-बार निवेश करने के बावजूद किसान को अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, जिससे वह कर्ज और चिंता के चक्र में फँस जाता है।सामाजिक विषमता
छोटे और बड़े किसानों के बीच मुआवजे का अंतर, ग्रामीण समाज में व्याप्त असमानता को उजागर करता है।मानसिक और भावनात्मक पीड़ा
किसान का रोना, उसकी विवशता और भगवान से संवाद—यह सब उसकी आंतरिक टूटन को दर्शाते हैं।आशा और प्रार्थना
अंततः किसान अपनी पीड़ा के बीच भी आशा नहीं छोड़ता, बल्कि ईश्वर से कृपा की अपेक्षा करता है।
समापन भाव
यह कविता हमें केवल किसानों की स्थिति से अवगत नहीं कराती, बल्कि हमें आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित करती है कि हम उस वर्ग के प्रति कितने संवेदनशील हैं, जो हमारे जीवन का आधार है। “किसानों की चिंता” वास्तव में एक चेतावनी है—प्रकृति, नीति और समाज—तीनों के संतुलन के बिना किसान का जीवन और देश का भविष्य दोनों संकट में पड़ सकते हैं।
जय किसान — यही कविता का मूल संदेश है, और यही हमारी जिम्मेदारी भी।
।।किसानों की चिंता।।
बे-मौसम बारिश आई,
किसानों की चिंता है बढ़ाई।
अभी तो धरती में बीज पड़े हैं,
अति आर्द्रता से अंदर ही सडे़ हैं।।
अब सरसों बोने की रुत चली गई,
इस बार किसानों की किस्मत छली गई।
खरीफ की फसल खेतों में सड़ गई,
बारिश होने से रबी की चिंता बढ़ गई।।
किसानों का बीज गया, जानवरों का चारा,
बार-बार खर्चा लगाकर, दु:खी हुआ बेचारा।
बच्चों की पढ़ाई, घर खर्च महंगा हो गया,
सुबह-सुबह बारिश देखा, तो बेचारा वह रो गया।।
अब घर-खर्च चलाएं या जानवर पालें,
छोटे किसानों को पड़ गए मुआवजे के लाले।
बड़े किसानों को अधिक मुआवजा मिलता है,
बिना फसल पकाये भी, खर्चा पूरा निकलता है।।
बे-मौसम की बारिश ने गेहूॅं, चने का रकबा बढ़ा दिया,
सिंचाई जरूरत पड़ेगी, पर डीजल दाम बढ़ा दिया।
फसल पकने लगी, फसल काटने की बारी आई,
फिर फसल सड़ाने हेतु, चारों ओर घटा छाई।।
किसानों के सारे सपने चूर-चूर होने लगे,
गलती सड़ती फसलें देखकर, किसान सारे रोने लगे।
हे!भगवान हमने तिलहन-दलहन अनाज से सबका पेट पाला है,
हम भोले-भाले जीवों पर, इतना कहर क्यों डाला है।।
हमें भी जीने की राह और उम्मीद दे दो,
चाहे हमसे कठिन परिश्रम और मेहनत ले लो।
हमारी मेहनत और अरमानों को मत मिटाओ तुम,
हमें आशीर्वाद दे दो, बिन मौसम बरसात मत बरसाओ तुम।।,
जय किसान, जय भगवान, जय कल्याण।
रचनाकार
कवि मुकेश कुमावत मंगल
टोंक राजस्थान।।
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