सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय संवाद
सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ से एक आत्मीय
शब्दों में भावों की साधिका हैं ..
राधिका की आराधिका है...
सारिका विजयवर्गीय 'वीणा'
शब्दों में भावों की साधना
बातचीत
प्रश्न १. सबसे पहले अपने बारे में हमारे पाठकों को कुछ बताइए।
उत्तर: "जय श्री कृष्ण .. मेरा नाम सारिका विजयवर्गीय ‘वीणा’ है। मेरे पति का नाम आनंद जी विजयवर्गीय है और मैं नागपुर, महाराष्ट्र में निवास करती हूँ। मैं स्वयं को सबसे पहले एक गृहलक्ष्मी मानती हूँ। घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ-साथ मुझे विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने और सीखने का अवसर मिला।
पढ़ने को शौक मुझे बचपन से था और ये शौक लगाया मुझे मेरे पापा ने .. वो स्कूल में प्रिंसिपल थे तो लाइब्रेरी में जो भी नई - नई किताबें आती थीं राजा- रानी, वीर क्रन्तिकारियों की, नैतिक शिक्षा, पंचतंत्र, चंपक, चंदा मामा, नन्दन, और भी बहुत सारी बाल कहानियाँ जो प्रेरणा भी देती थीं बहुत कुछ सिखाती भी थीं साथ ही कल्पनालोक में विचरण भी करवाती थीं...संवेदनशील हृदय ही कवि की पहचान है बस यहीं से शुरुआत हुई थी मेरी कवयित्री बनने की... गद्य-पद्य दोनों विधाओं में मैंने छोटा-छोटा सा लिखना तेरह-चौदह साल की उम्र से शुरू कर दिया था... शादी से पहले स्कूल, कॉलेज, दैनिक भास्कर के 'मधुरिमा' अंक में मेरी रचनाओं का प्रकाशन होता आया है।
विवाह पश्चात ये यात्रा सिमट गई थी.. नई जिंदगी- नई यात्रा में खुद को मैने व्यस्त कर लिया... बच्चों को भी खुद ही घर पर पढ़ाया करती थी ... उनको देखकर उनके दोस्त और अन्य बच्चे भी मेरे पास पढ़ने आने लगे। यहाँ से मेरी ट्यूशन यात्रा शुरू हुई थी।
मैं शिक्षिका रह चुकी हूँ और कोरोना काल तक घर पर ट्यूशन कक्षाएँ भी लेती थी। वर्तमान में, मैं टैरो कार्ड रीडिंग और अंकज्योतिष विधा से जुड़ी हूँ तथा एस्ट्रोटाक कम्पनी में एक एस्ट्रोलॉजर के रूप में कार्य कर रही हूँ। इसके साथ ही अंकज्योतिष की कक्षाएँ भी लेती हूँ।
वर्तमान में नई पीढ़ी का रुझान साहित्य की तरफ बड़े इस हेतु प्रयासरत हूँ और साहित्य सेवा में अपना योगदान दे रही हूँ।"
प्रश्न २. साहित्य की ओर आपका रुझान कैसे विकसित हुआ?
उत्तर: "मेरे भीतर भावों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से रही है। जब मन में कोई भाव जन्म लेता है तो उसे शब्दों में ढालने की इच्छा होती है। धीरे-धीरे यही अभिव्यक्ति साहित्य-साधना का रूप लेती गई।
वैसे साहित्य से लगाव बचपन से था ... बीच में ब्रेक लिया फिर बच्चे बड़े हुए... मेरी बेटी के हाथ एक दिन मेरी पुरानी डायरी लग गई .. उसने उसे पढ़ा बहुत खुश हुई और बोली ममी अब आप पुनः लिखना शुरू करो.. और उसने मुझे कुछ साहित्यक समूह से जोड़ दिया.. मैंने फिर से लिखना शुरू किया.. बहुत सारी प्रतियोगिता में भाग लिया जीती.. उत्साह बड़ा.. और अब साहित्य सेवा को ही अपने जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बना लिया ।
आज मैं गद्य और पद्य दोनों विधाओं में लिखती हूँ। मेरे लिए साहित्य केवल लेखन नहीं, बल्कि मन के भावों को समाज और पाठकों तक पहुँचाने का एक माध्यम है।"
प्रश्न ३. आपके साहित्यिक लेखन की प्रमुख विशेषता क्या है?
उत्तर: ''मैं गद्य और पद्य दोनों विधाओं में अपनी बात कहने का प्रयास करती हूँ। कविता में भावों की सहज अभिव्यक्ति मुझे आकर्षित करती है, जबकि गद्य मुझे किसी विषय को विस्तार और स्पष्टता के साथ रखने का अवसर देता है।
छंदों के प्रति भी मेरी विशेष रुचि है। विभिन्न छंदों में लेखन करते हुए मुझे यह अनुभव हुआ है कि छंद केवल बंधन नहीं, बल्कि भावों को एक विशेष लय और सौंदर्य प्रदान करने का माध्यम है।"
प्रश्न ४. आपकी रचनाएँ किन-किन माध्यमों में प्रकाशित हुई हैं?
उत्तर: "मेरी रचनाएँ स्कूल की पत्र-पत्रिकाओं से लेकर विभिन्न समाचार-पत्रों और साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। इनमें दैनिक भास्कर, नवभारत, समग्र तूलिका, दैनिक क्रांति जागरण, नवीन कदम, निराला राजस्थान, दैनिक युगपक्ष जैसलमेर, काव्यांजली पत्रिका, अंकुर हिंदी साहित्य और कालसाक्षी पत्रिका आदि शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त विभिन्न साझा-संग्रहों में भी मेरी रचनाओं को स्थान मिला है। ‘बज्मे-हिन्द’, ‘क्षितिज शब्दों का आसमान’, ‘काव्यांजली आरुषि पत्रिका’ और ‘पॉवर ऑफ वन (नागपुर)’ आदि में मेरी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हुई हैं। कुछ अन्य साझा-संग्रहों में भी मेरी कविताएँ शीघ्र प्रकाशित होने वाली हैं।"
प्रश्न ५. आपकी प्रकाशित पुस्तकों के बारे में बताइए।
उत्तर: "हाल ही में मेरी दो पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं—‘मधुरालय’ और ‘कुलदेवी चालीसा’।
‘मधुरालय’ एक नौ-रस युक्त गीत-संग्रह है। इसमें विभिन्न भावों को गीतों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया गया है। ‘कुलदेवी चालीसा’ भी छंद आधारित रचना है।
इन दोनों पुस्तकों का मेरे लिए विशेष महत्व है, क्योंकि इनके माध्यम से छंद-विधा के प्रति मेरी रुचि और साधना को एक पुस्तकाकार अभिव्यक्ति मिली है।"
प्रश्न ६. समाजशास्त्र में स्वर्णपदक प्राप्त करना आपकी यात्रा में कितना महत्वपूर्ण रहा?
उत्तर: समाजशास्त्र में स्वर्णपदक प्राप्त करना मेरे लिए गौरव का विषय है। मुझे आदरणीया सुमित्रा महाजन जी के हाथों स्वर्णपदक और स्मृति-चिह्न से सम्मानित होने का अवसर मिला।
मेरे लिए यह उपलब्धि केवल एक पुरस्कार नहीं, बल्कि अध्ययन और परिश्रम के प्रति मिले प्रोत्साहन का प्रतीक है। मातेश्वरी सुगनी देवी महाविद्यालय, इंदौर द्वारा भी मुझे ₹5100 की राशि प्राप्त हुई। ऐसे सम्मान व्यक्ति को आगे और बेहतर करने की प्रेरणा देते हैं। साथ ही सुगनी देवी कॉलेज के हाल की वाल पर मेरा बड़ा सा फ़ोटो भी लगा हुआ है... जिस पर .मेरे नाम के साथ . .स्वर्ण पदक अलंकृत लिखा हुआ...☺️
प्रश्न ७. आपको साहित्य के क्षेत्र में किन प्रमुख सम्मानों से सम्मानित किया गया है?
उत्तर: "विभिन्न साहित्यिक और सामाजिक संस्थाओं ने समय-समय पर मेरी रचनाओं को सराहा और प्रशस्ति-पत्र तथा स्मृति-चिह्न देकर सम्मानित किया।
काव्यांचल साहित्यिक संस्था से मुझे छंद महारथी सम्मान तथा रजत प्रशस्ति पत्र (गद्य गौरव सम्मान) प्राप्त हुआ।
साहित्यदीप से साहित्यदीप शलभ सम्मान, साहित्यदीप मेघा सम्मान-द्वितीय तथा साहित्यदीप शब्द शिल्पकार-तृतीय सम्मान प्राप्त हुए।
उड़ान संस्था द्वारा भी मुझे प्रशस्ति-पत्र, स्मृति-चिह्न और शॉल से सम्मानित किया गया। इस संस्था में ,मैं गद्य प्रतियोगिता की कार्यक्रम अध्यक्ष भी रह चूंकि हूँ।
इसके अतिरिक्त नागपुर और विदर्भ के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंचों से भी समय-समय पर सम्मान प्राप्त होता रहा है।"
प्रश्न ८. नागपुर की साहित्यिक गतिविधियों से आपका जुड़ाव कैसा रहा है?
उत्तर: "नागपुर और विदर्भ की साहित्यिक भूमि से जुड़ना मेरे लिए सौभाग्य की बात है। मुझे नागपुर विदर्भ हिंदी साहित्य मंच पर काव्य-पाठ करने तथा वरिष्ठ और दिग्गज कवियों को सुनने और उनका स्नेहाशीष प्राप्त करने के अवसर मिलते रहते हैं।
इन मंचों से मिलने वाला अनुभव मेरे साहित्यिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी वरिष्ठ रचनाकार को सुनना भी अपने आप में एक सीख होती है।"
प्रश्न ९. विजयवर्गीय समाज से जुड़े साहित्यिक आयोजनों में भी आपने भाग लिया है। उसके बारे में कुछ बताइए।
उत्तर: "जी हाँ। राष्ट्रीय अखिल भारतीय विजयवर्गीय महिला मंडल द्वारा आयोजित 15 अगस्त 2025 के ऑनलाइन काव्य-पाठ में मुझे पुरस्कार स्वरूप ₹500 की राशि प्राप्त हुई।
लॉकडाउन के समय अखिल भारतीय विजयवर्गीय वैश्य महासभा द्वारा आयोजित ‘लॉक डाउन’ विषयक गद्य प्रतियोगिता में भी मुझे ₹500 की पुरस्कार राशि और प्रमाण-पत्र प्राप्त हुआ।
इसके अतिरिक्त मीरा बाई पर गीत लेखन के लिए विजयवर्गीय नवयुवक कोटा मंडल द्वारा प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया। ऐसे आयोजन साहित्य को समाज और अपनी सामाजिक जड़ों से जोड़ने का अवसर देते हैं।
प्रश्न १०. एक गृहिणी, शिक्षिका, एस्ट्रोलॉजर और साहित्यकार—इन सभी भूमिकाओं के बीच संतुलन कैसे बनाती हैं?
उत्तर: "जीवन में भूमिकाएँ अलग-अलग हो सकती हैं, लेकिन उनके बीच संतुलन हमारी सोच और समय-प्रबंधन पर निर्भर करता है। गृह-परिवार मेरी प्राथमिक जिम्मेदारी है।
मेरा मानना है कि जितने प्यार और अपनेपन से हम अपने परिवार का ध्यान रख सकते है उतना पैसा लेकर काम करने वाली गृह-सहायिका नहीं।
दूसरे काम हम गृह-सहायिका से करवा सकते है पर मेरा मानना है की परिवार के लिए भोजन और बच्चों की शिक्षा यह दोनों काम परिवार की महिला को ही करना चाहिए। जितना शुद्ध , प्रेम और अपनत्व भाव से वो भोजन बनाएगी उतना सुस्वादु भोजन दूसरा कोई नहीं बना सकता है। तथा उनके शिक्षण पर ध्यान देना ... बच्चों के शारिरिक, मानसिक विकास में एक माँ से अच्छा योगदान कोई नही दे सकता... उसके बाद का समय आपका ही है.. अपने घर परिवार के काम करते - करते उसके साथ जो समय और अवसर मिलता है, उसमें मैं अपने अन्य कार्यों को आगे बढ़ाती हूँ।
शिक्षण ने मुझे लोगों को समझना सिखाया, अंकज्योतिष और टैरो कार्ड रीडिंग ने अध्ययन और विश्लेषण की एक अलग दृष्टि दी और साहित्य ने मुझे भावों को शब्द देने का माध्यम दिया। मुझे लगता है कि जीवन के ये अनुभव एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि कहीं न कहीं एक-दूसरे को निरंतर समृद्ध करते रहते हैं।"
प्रश्न ११. क्या आपको लगता है कि आपके अन्य कार्यों ने आपके साहित्यिक लेखन को भी प्रभावित किया है?
उत्तर: "निश्चित रूप से। मनुष्य जितने अधिक अनुभवों से गुजरता है, उसकी दृष्टि उतनी ही व्यापक होती जाती है। शिक्षण के दौरान विद्यार्थियों और परिवारों को समझने का अवसर मिला। वर्तमान कार्य में लोगों की जिज्ञासाओं और जीवन से जुड़े प्रश्नों को समझने का अवसर मिलता है।"
इन अनुभवों का प्रभाव स्वाभाविक रूप से लेखन पर पड़ता है। जीवन ही साहित्य का सबसे बड़ा विद्यालय है।"
प्रश्न १२. आपके लिए साहित्य सेवा का अर्थ क्या है?
उत्तर: "मेरे लिए साहित्य सेवा का अर्थ है—अपने भावों और विचारों को ऐसे शब्द देना, जो किसी के मन को छू सकें, किसी को सोचने के लिए प्रेरित कर सकें या किसी के जीवन में सकारात्मकता ला सकें।
साहित्य केवल प्रसिद्धि पाने का माध्यम नहीं होना चाहिए। वह समाज, संवेदना और मानवीय मूल्यों से जुड़ने का माध्यम भी है।"
प्रश्न १३. छंदों के प्रति आपकी विशेष रुचि क्यों है?
उत्तर: छंद में शब्दों के साथ लय, गति और अनुशासन भी जुड़ता है। भावों को छंद की संरचना में ढालना चुनौतीपूर्ण भी है और आनंददायक भी।
मेरी पुस्तकों में भी विभिन्न प्रकार के छंदों का प्रयोग हुआ है। छंदों का अभ्यास करते हुए मुझे यह महसूस हुआ कि परंपरा और सृजनशीलता साथ-साथ चल सकती हैं।"
प्रश्न १४. आपकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या है?
उत्तर: "यदि पुरस्कारों और सम्मानों की बात करूँ तो प्रत्येक सम्मान मेरे लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन मेरे लिए जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पदक, पुरस्कार या प्रमाण-पत्र नहीं है।
मेरे मन में भावों को शब्दों के माध्यम से व्यक्त करने का हुनर मिला—यही ईश्वर की ओर से मिली मेरी सर्वोत्तम उपलब्धि है।
जब कोई भाव शब्द बनकर किसी दूसरे मन तक पहुँचता है और वहाँ अपनी जगह बना लेता है, तो उससे बड़ा पुरस्कार मेरे लिए और क्या हो सकता है?"
प्रश्न १५. आज की महिला के लिए आपका क्या संदेश है?
उत्तर: "महिला के जीवन में परिवार और समाज के प्रति जिम्मेदारियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उसके भीतर मौजूद प्रतिभा और रचनात्मकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। अपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए यदि महिला अपने भीतर की प्रतिभा को भी समय दे सके तो उसका व्यक्तित्व और अधिक समृद्ध होता है।
मेरी अपनी यात्रा भी यही बताती है कि जीवन के किसी भी पड़ाव पर सीखना, सृजन करना और आगे बढ़ना संभव है।
और ऐसा करना भी चाहिए अपने शारिरिक, मानसिक स्वास्थ्य के लिए...!"
प्रश्न १६. नई पीढ़ी के साहित्यकारों और रचनाकारों के लिए आप क्या कहना चाहेंगी?
उत्तर: "सबसे पहले पढ़िए, फिर लिखिए और लगातार सीखते रहिए। साहित्य में धैर्य बहुत जरूरी है। एक-दो रचनाओं के प्रकाशित हो जाने या सम्मान मिल जाने को अंतिम उपलब्धि न मानें।
वरिष्ठ साहित्यकारों को पढ़ें, उनकी रचनाएँ सुनें, अपनी भाषा और विधा को समझें तथा निरंतर अभ्यास करें। सबसे महत्वपूर्ण है कि अपनी मौलिक आवाज को बनाए रखें।"
प्रश्न १७. आपकी आगामी साहित्यिक योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर: "साहित्य-साधना निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। आगे भी गद्य और पद्य इन दोनों विधाओं में लिखना चाहती हूँ। विशेष रूप से छंद लेखन को आगे बढ़ाना और अपनी रचनाओं को पाठकों तक पहुँचाना मेरी प्राथमिकताओं में रहेगा।
साहित्य के माध्यम से जो कुछ समाज और पाठकों को सकारात्मक रूप से दिया जा सके, वही मेरी आगे की यात्रा का उद्देश्य है।"
प्रश्न १८. अंत में, अपने पाठकों और साहित्यिक साथियों के लिए कोई संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर: "मैं सभी पाठकों, साहित्यिक साथियों, वरिष्ठ रचनाकारों और उन संस्थाओं के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ, जिन्होंने मेरी रचनाओं को पढ़ा, सराहा और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
मैं मानती हूँ कि साहित्य की यात्रा अकेले की यात्रा नहीं होती। पाठक, परिवार, साहित्यिक मित्र और मार्गदर्शक—सभी मिलकर एक रचनाकार को आगे बढ़ाते हैं।
मैं आगे भी अपने मन के भावों को शब्दों में पिरोकर साहित्य की सेवा करती रहूँगी। यदि मेरी कोई रचना किसी एक व्यक्ति के मन को छू सके, उसे कुछ सोचने को विवश कर सके या उसके चेहरे पर मुस्कान ला सके, तो मैं उसे अपनी सार्थकता मानूँगी।
मेरे लिए सचमुच यही सबसे बड़ा पुरस्कार है कि ईश्वर ने मुझे भावों को शब्द देने की क्षमता दी।"
सूचना स्रोत
सारिका-विजयवर्गीय ‘वीणा’
नागपुर (महाराष्ट्र)

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