जीवन के सच से जुड़ा वृत्तांत
जीवन के सच से जुड़ा वृत्तांत
भूमिका
जीवन की सबसे बड़ी शिक्षाएँ हमेशा पुस्तकों के पन्नों से नहीं मिलतीं; अनेक बार वे हमारे छोटे-छोटे अनुभवों, सामूहिक प्रयासों और गुरुजनों के सान्निध्य से हमारे व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन जाती हैं। बचपन में किए गए कुछ साधारण-से कार्य समय के साथ असाधारण जीवन-मूल्यों का आधार बन जाते हैं। यही अनुभव हमें सिखाते हैं कि श्रम कभी छोटा नहीं होता, सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती और आत्मनिर्भरता ही जीवन की वास्तविक शक्ति है। प्रस्तुत वृत्तांत भी विद्यालयीन जीवन की ऐसी ही एक स्मृति है, जिसने केवल एक चबूतरे का निर्माण नहीं किया, बल्कि अनेक विद्यार्थियों के व्यक्तित्व को भी गढ़ दिया।
स्वावलंबन की सीख
बात उस समय की है, जब हम सातवीं-आठवीं कक्षा में पढ़ते थे। गाँव में केवल एक ही सरकारी विद्यालय था और गाँव के सभी बच्चे वहीं शिक्षा ग्रहण करने जाते थे। उस समय शिक्षा और शिक्षकों—दोनों का स्तर अत्यंत उच्च था। बच्चों के मन में शिक्षकों के प्रति सम्मान के साथ-साथ अनुशासन का स्वस्थ भय भी रहता था। शिक्षक भी पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपने कर्तव्य का निर्वहन करते थे। आवश्यकता पड़ने पर शारीरिक दंड भी दिया जाता था। न तो बच्चों को उससे बुरा लगता था और न ही उनके अभिभावकों को। उनका मानना था कि यदि बालक गलती करे, तो उसे समझाना, डाँटना और आवश्यकता पड़ने पर दंड देना भी उसके हित में होता है।
उस समय सरकारी विद्यालयों में संसाधनों का अभाव रहता था। हमारे विद्यालय में एक कच्चा चबूतरा था, जिसका उपयोग मंच के रूप में किया जाता था। कच्चा होने के कारण वह समय-समय पर टूट-फूट जाता था। इसलिए जब भी 15 अगस्त या 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्व निकट आते, उसकी मरम्मत की जिम्मेदारी बड़ी कक्षाओं की छात्राओं को सौंप दी जाती थी।
राष्ट्रीय उत्सवों की तैयारियाँ लगभग पंद्रह दिन पहले ही प्रारंभ हो जाती थीं। यह समूचा कार्य हमारे शारीरिक शिक्षक श्री कालूराम जी के नेतृत्व में होता था। हम सभी विद्यार्थियों में इस कार्य को लेकर अपार उत्साह रहता था।
चबूतरे की मरम्मत के लिए सबसे पहले हमें लगभग एक-दो किलोमीटर दूर जाकर विशेष प्रकार की मिट्टी खोदकर लानी पड़ती थी। वह स्थान एक छोटे तालाब जैसा था, जिसमें वर्षा ऋतु में पानी भर जाता था। इसी कारण वहाँ की मिट्टी काली, चिकनी और अत्यंत बारीक होती थी, जो गारा बनाने के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती थी।
हम उस मिट्टी को सिर पर ढोकर विद्यालय तक लाते थे। इसके लिए कई चक्कर लगाने पड़ते थे। उसके बाद मिट्टी को पानी डालकर भिगोया जाता, अच्छी तरह गूँथा जाता और गारा तैयार किया जाता। पानी भी लगभग पाँच सौ मीटर दूर स्थित हैंडपंप से लाना पड़ता था।
गारा तैयार होने के बाद सबसे पहले चबूतरे के गड्ढों और उबड़-खाबड़ हिस्सों को समतल किया जाता। फिर उसे एक दिन सूखने के लिए छोड़ दिया जाता। अगले दिन गोबर और गेरू से उसे लीपा जाता तथा अंत में खड़ी (सफेद पाउडर) से उस पर सुंदर मांडने बनाए जाते।
उस समय पूरे विद्यालय का वातावरण ऐसा प्रतीत होता था, मानो होली और दीपावली दोनों एक साथ आ गई हों। हमें अत्यंत गर्व होता था कि हमारे हाथों से संवारा गया वही चबूतरा राष्ट्रीय पर्वों के सभी सांस्कृतिक और औपचारिक कार्यक्रमों का केंद्र बनता था। पूरे गाँव के लोग वहाँ एकत्र होकर उत्सव का आनंद लेते थे और हमें अपने श्रम का प्रतिफल उनके प्रसन्न चेहरों में दिखाई देता था।
वास्तव में, यह एक कार्य हमारे व्यक्तित्व के अनेक आयामों को विकसित कर गया। इससे हमें टीम भावना, सेवा, समर्पण, परिश्रम, अनुशासन, सहयोग तथा गुरुजनों की आज्ञा का ईमानदारीपूर्वक पालन करने की प्रेरणा मिली। सबसे बड़ी सीख मिली स्वावलंबन की। हमने जाना कि कोई भी कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता। यदि कार्य उचित और नैतिक है, तो उसे करने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए।
उस चबूतरे ने हमें केवल निर्माण का कौशल ही नहीं सिखाया, बल्कि जीवन के अनमोल संस्कार भी दिए। गुरुजनों के मार्गदर्शन में किया गया वह श्रम आज भी जीवन की सबसे सुंदर और प्रेरणादायक स्मृतियों में से एक है।
इसीलिए मैं मानती हूँ कि विद्यालयों में बच्चों से करवाई जाने वाली सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ अनावश्यक नहीं होतीं। वे उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में अत्यंत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ऐसी गतिविधियाँ बच्चों में आत्मविश्वास, स्वावलंबन, श्रम के प्रति सम्मान और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करती हैं। अतः बच्चों और अभिभावकों—दोनों को इन गतिविधियों का विरोध करने के स्थान पर उत्साहपूर्वक उनमें सहभागिता निभानी चाहिए। यही अनुभव आगे चलकर जीवन की सबसे बड़ी पूँजी सिद्ध होते हैं।
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