जिज्ञासा और जिज्ञासा क्षुधा शांति

सोनिया सिंह 'जागृति' की जिज्ञासा

इंसान प्रायः बाहर की दुनिया से नहीं, अपने ही भीतर से लड़ता है—अपने भय, असंतोष और अपेक्षाओं से। वह नाराज़ भी उसी मन से होता है, जो उसे बार-बार प्रश्नों में उलझाता है। दूसरों के दर्द से आहत होना, किसी को परेशान न देख पाना, अच्छे-बुरे का ज्ञान बाँटना और किसी के लिए फिक्रमंद रहना—ये सब मन की उसी जिज्ञासा से उपजते हैं, जो अर्थ और अपनत्व खोजती है। इसी जिज्ञासा के कारण इंसान अपनी ऊर्जा, समय, पैसा और तवज्जो वहाँ लुटाता है, जहाँ उसे अपने अस्तित्व का उत्तर मिलता प्रतीत होता है। जब यह जिज्ञासा समझ और विवेक से जुड़ती है, तब मन की क्षुधा शान्त होती है; अन्यथा वही जिज्ञासा असंतोष और द्वंद्व का कारण बन जाती है।

जिज्ञासा क्षुधा-शान्ति 

प्रश्नवार उत्तर एवं निष्कर्ष

इंसान किससे लड़ता है?

इंसान मूलतः बाहर नहीं, अपने ही भीतर के द्वंद्व से लड़ता है—अपने भय, असुरक्षा, अहं और अधूरी अपेक्षाओं से। बाहरी संघर्ष तो केवल आंतरिक युद्ध का6 प्रतिबिंब होते हैं।

किस से नाराज़ होता है?

वह उन्हीं से नाराज़ होता है जिनसे उसे उम्मीद होती है, पर वास्तविकता में उसकी नाराज़गी भी अक्सर अपनी ही अपेक्षाओं से होती है, जिन्हें वह दूसरों पर आरोपित कर देता है।

किसके दर्द से आहत होता है?

जिसके दर्द में उसे अपना अक्स दिखाई देता है—वही उसे सबसे अधिक आहत करता है। अपरिचित पीड़ा से नहीं, बल्कि परिचित संवेदना से चोट लगती है।

किसको परेशान नहीं देख पाता?

वह उसी को परेशान नहीं देख पाता, जिससे उसका भावनात्मक जुड़ाव हो—क्योंकि उसकी बेचैनी, मन की नैतिक चेतना को झकझोर देती है।

किसको अच्छे-बुरे का ज्ञान बाँटता है?

वह ज्ञान उन्हीं को बाँटता है जिनमें वह अपनी अधूरी समझ को पूरा होता देखना चाहता है—कभी मार्गदर्शन के नाम पर, कभी आत्मसंतोष के लिए।

किसके लिए फिक्रमंद होता है?

वह उन्हीं के लिए फिक्रमंद होता है जिनसे उसका अस्तित्व, सम्मान या भावनात्मक सुरक्षा किसी न किसी रूप में जुड़ी होती है।

किस पर अपनी ऊर्जा, समय, पैसा और तवज्जो लुटाता है?

इंसान वहीं सब कुछ लुटाता है जहाँ उसे लगता है कि वह महत्वपूर्ण है या फिर उसको सुना जा रहा है अथवा जहाँ उसे अपने होने का अर्थ मिलता है।

निष्कर्ष 

जिज्ञासा की शान्ति

इन सभी प्रश्नों का मूल उत्तर “दूसरा” नहीं, “स्वयं” है। इंसान जिनसे लड़ता है, जिनसे नाराज़ होता है, जिनके लिए व्याकुल होता है—वह दरअसल अपने भीतर के असंतुलन, प्रेम, भय और अपेक्षाओं से संवाद कर रहा होता है। जब यह समझ पुख़्ता हो जाती है कि बाहरी प्रतिक्रियाएँ आंतरिक अवस्थाओं का परिणाम हैं, तब जिज्ञासा शांत होती है। यही जिज्ञासा-क्षुधा-शान्ति है—जहाँ मन प्रश्नों से मुक्त होकर स्वीकार और संतुलन में प्रवेश करता है।

सूचना स्रोत

सोनिया सिंह 'जागृति'

स्थानीय संपादिका

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