डॉ अशोक कुमार चौधरी का आत्मकथ्य

एक आत्मकथ्य 

एक आत्मीय क्षण, एक ऐतिहासिक अनुभूति

उस दिन मेरे लिए केवल एक औपचारिक अवसर नहीं था, बल्कि यह मेरे जीवन के उन विरल क्षणों में से एक था, जहाँ श्रम, संवेदना और संस्कार—तीनों एक साथ साकार होते प्रतीत हुए। जब मैंने अपनी स्वरचित पुस्तक संघ के आदरणीय सह सरकार्यवाह श्री कृष्ण गोपाल जी को भेंट की, तो वह क्षण केवल पुस्तक सौंपने का नहीं, बल्कि अपने विचारों, अपनी साधना और अपने अंतर्मन को समर्पित करने का था।




मेरे साथ उस समय धनौरा के डॉ. यतेंद्र कटारिया जी और सेवानिवृत्त एसपी श्री रमेश गुर्जर जी की उपस्थिति ने उस क्षण को और भी गरिमा प्रदान की। हम सभी के चेहरों पर एक संतोष था—मानो हम किसी व्यक्तिगत उपलब्धि के नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक उत्तरदायित्व के सहभागी हों।

जब मैंने अपनी पुस्तक उनके हाथों में सौंपी, तो मन में एक सहज प्रश्न भी उठा—क्या मेरे शब्द उस परंपरा के अनुरूप हैं, जिसे हम जीने का प्रयास करते हैं? परन्तु उनके स्नेहिल भावों ने यह आश्वस्त किया कि प्रयास ही सबसे बड़ी साधना है।

इस पूरी यात्रा का एक और भावुक आयाम तब सामने आया, जब मैं मेरठ साउथ के नमो भारत स्टेशन पर उतरा। मेट्रो के प्रवेश द्वार पर 1857 के अमर क्रांतिकारी शहीदों—कोतवाल धन सिंह कोतवाल और राव कदम सिंह—के तैल चित्र अंकित थे। उन चित्रों को देखकर मैं ठिठक गया। लगा जैसे इतिहास स्वयं मुझे पुकार रहा हो।

मैंने अनायास ही उन चित्रों की वीडियो बना ली—शायद इसलिए नहीं कि उन्हें संजो सकूँ, बल्कि इसलिए कि उस क्षण की अनुभूति को अपने भीतर स्थायी कर सकूँ। उन वीरों की आँखों में जो ज्वाला थी, वह आज भी हमें हमारी जिम्मेदारियों का स्मरण कराती है।

उस दिन मैंने अनुभव किया कि पुस्तक लिखना केवल शब्दों का संयोजन नहीं होता, बल्कि यह इतिहास, संस्कृति और समर्पण के सूत्रों को एक धागे में पिरोने जैसा होता है। और जब वही पुस्तक किसी ऐसे व्यक्तित्व को भेंट की जाए, जो स्वयं उस परंपरा का जीवंत प्रतिनिधि हो, तब वह क्षण एक साधारण घटना नहीं, बल्कि एक आत्मिक उत्सव बन जाता है।

यह सम्पूर्ण प्रकरण मेरे लिए एक प्रेरणा है—कि मैं अपने लेखन और जीवन, दोनों में उन मूल्यों को और अधिक सशक्त कर सकूँ, जिनकी झलक मुझे उस दिन हर चेहरे, हर शब्द और हर दृश्य में दिखाई दी।

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