विमर्श बिन्दु

इतिहास को लघुतम कर वर्तमान को विराट करना कितना उचित

क्या यही पत्रकारिता है?

भूमिका

कभी-कभी समाचारों की भाषा केवल सूचना देने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह पाठकों की सोच को एक विशेष दिशा में मोड़ने का प्रयास भी करने लगती है। जब किसी वर्तमान निर्णय या घटना को अत्यधिक महिमामंडित करते हुए उसके पीछे मौजूद ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, पूर्व नीतिगत निर्णयों और उन लोगों की दूरदर्शिता को लगभग अदृश्य कर दिया जाता है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या हम वास्तव में पत्रकारिता पढ़ रहे हैं या किसी दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास देख रहे हैं। घटनाएँ समय की निरंतरता में जन्म लेती हैं—उनकी जड़ें अतीत में होती हैं और परिणाम वर्तमान में दिखाई देते हैं। ऐसे में यदि समाचार केवल वर्तमान को ही केंद्र बनाकर लिखा जाए और उस नींव को अनदेखा कर दिया जाए जिस पर वह वर्तमान खड़ा है, तो पाठकों के सामने वास्तविकता का अधूरा चित्र ही प्रस्तुत होता है। यही वह स्थिति है जहाँ विचारशील समाज को ठहरकर यह सोचना पड़ता है कि सूचना और प्रस्तुतीकरण के बीच की रेखा कहीं धुंधली तो नहीं हो रही।

विमर्श का मूल

समाचार का अंश

"ढाका: भारत एक बार फिर बांग्लादेश के लिए तारणहार बनकर आया है। ईरान की जंग के चलते दुनिया भर में आए ऊर्जा संकट के दौरान भारत ने बांग्लादेश को 5000 टन डीजल की सप्लाई भेजी है। खास बात है कि यह आपूर्ति उसी पाइपलाइन से की गई है, जिसका निर्माण पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान किया गया था। इस आपूर्ति ने शेख हसीना के खिलाफ फैलाए गए जमात और BNP के उस प्रोपेगैंडा की भी पोल खोल दी है, जिसमें पाइपलाइन की भारतीय दबदबे का प्रतीक कहकर आलोचना की गई थी। शेख हसीना को भारतीय एजेंट तक कहा गया और उन पर देश बेचने का आरोप लगाया गया।" दैनिक नवभारत टाइम्स के सोशल मीडिया पर प्रचारित प्रसारित पत्रकार विवेक सिंह के समाचार का एक अंश

इतिहास को लघुतम कर वर्तमान को विराट करना कितना उचित

समाचार केवल सूचना नहीं होते, वे समाज की स्मृति भी गढ़ते हैं। जब कोई लेखक या मीडिया संस्थान किसी घटना को प्रस्तुत करता है, तो वह केवल वर्तमान का वर्णन नहीं कर रहा होता, बल्कि अतीत और भविष्य के बीच एक वैचारिक सेतु भी बना रहा होता है। ऐसे में यदि समाचार का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार किया जाए कि वर्तमान को असाधारण और अतीत को नगण्य सिद्ध कर दिया जाए, तो यह पत्रकारिता की मूल आत्मा से भटकाव माना जाएगा।

हाल ही में एक समाचार में यह कहा गया कि भारत ने ऊर्जा संकट के समय बांग्लादेश को डीजल भेजकर “तारणहार” की भूमिका निभाई। सतही दृष्टि से यह कथन आकर्षक प्रतीत हो सकता है, किंतु जब हम इसके पीछे के तथ्यों को देखते हैं तो पता चलता है कि जिस पाइपलाइन के माध्यम से यह आपूर्ति संभव हुई, उसका निर्माण वर्षों पहले की गई दूरदर्शी योजना और निर्णयों का परिणाम है।

यही वह बिंदु है जहाँ पत्रकारिता की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। किसी भी वर्तमान उपलब्धि को रेखांकित करते समय यदि उस उपलब्धि के पीछे खड़े पूर्व निर्णयों, नीतियों और व्यक्तियों की भूमिका को गौण कर दिया जाए, तो वह अधूरी कथा बन जाती है। अधूरी कथा अक्सर भ्रम को जन्म देती है।

वास्तविकता यह है कि राष्ट्रों के बीच बनने वाले बड़े ढांचागत संबंध — चाहे वे पाइपलाइन हों, रेलमार्ग हों या सांस्कृतिक संवाद — एक दिन में नहीं बनते। वे कई वर्षों की कूटनीतिक समझ, प्रशासनिक दूरदर्शिता और परस्पर विश्वास का परिणाम होते हैं। इसलिए यदि आज किसी संकट की घड़ी में कोई व्यवस्था काम कर रही है, तो उसके पीछे अतीत की कई परतें और कई निर्णय छिपे होते हैं।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब समाचार का स्वर ऐसा बना दिया जाता है कि वह तथ्यात्मक से अधिक भावनात्मक या राजनीतिक प्रतीत होने लगे। “तारणहार”, “मसीहा” जैसे शब्द किसी विश्लेषणात्मक समाचार की भाषा नहीं, बल्कि प्रचारात्मक लेखन की भाषा अधिक लगते हैं। ऐसी शब्दावली पाठकों के मन में तत्काल प्रभाव तो पैदा करती है, परंतु वह विवेकपूर्ण समझ को सीमित कर देती है।

पत्रकारिता का धर्म यह नहीं है कि वह किसी एक समय या किसी एक निर्णय को सर्वोच्च सिद्ध करे। उसका वास्तविक दायित्व यह है कि वह घटनाओं को उनके पूरे परिप्रेक्ष्य में रखे। यदि किसी व्यवस्था की शुरुआत अतीत में हुई और उसका लाभ वर्तमान में मिल रहा है, तो यह एक निरंतरता का उदाहरण है, न कि किसी एक पक्ष की विजय का।

दरअसल, समाज को भ्रमित करने वाली सबसे सूक्ष्म प्रक्रिया यही होती है कि इतिहास के योगदान को धीरे-धीरे धुंधला कर दिया जाए और वर्तमान को एकमात्र निर्णायक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाए। जबकि सच यह है कि वर्तमान, अतीत की नींव पर ही खड़ा होता है।

इसलिए हर श्रेणी के लेखक, पत्रकार और विश्लेषक को यह समझना होगा कि शब्द केवल वाक्य नहीं बनाते, वे दृष्टिकोण भी बनाते हैं। यदि शब्द संतुलित होंगे तो समाज संतुलित समझ विकसित करेगा, और यदि शब्दों में अतिशयोक्ति और चयनात्मकता होगी तो जनमत भी उसी दिशा में झुकने लगेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि समाचारों को तात्कालिक प्रभाव से अधिक दीर्घकालिक सत्य के आधार पर लिखा जाए। अतीत के सकारात्मक निर्णयों को सम्मान देते हुए वर्तमान की भूमिका का उल्लेख करना ही वह संतुलन है जो पत्रकारिता को विश्वसनीय बनाता है।

क्योंकि अंततः किसी राष्ट्र की प्रगति किसी एक दिन की उपलब्धि नहीं होती—

वह अनेक कालखंडों की सामूहिक बुद्धिमत्ता का परिणाम होती है।

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