हास्य करें, उपहास नहीं

हास्य करें, उपहास नहीं

बचपन की हँसी-ठिठोली थी 

कितनी मासूम और भोली।

घर-घर में फुदकते रहते,

चंचल बच्चे बनाकर टोली।

"देख तेरे पीछे चूहा… देख तेरे पीछे बिल्ली…!"

कहते हुए जब बच्चे किसी को डराते और उसके डर जाने पर ताली बजाकर हँसते हुए कहते—

"अप्रैल फूल बनाया, बड़ा मज़ा आया!"

तो बड़े भी मुस्कुराए बिना नहीं रह पाते थे।

यही था अप्रैल फूल का सच्चा आनंद।

दरअसल, बच्चे मासूमियत से भरे होते हैं। वे हर दिन नई शरारत करते हैं, पर उनकी नीयत कभी किसी को तकलीफ़ पहुँचाने की नहीं होती। इसलिए उनकी हर शरारत अनायास ही बड़ों के होठों पर मुस्कान ले आती है।

उपहास और हास्य में बहुत अंतर है।

"हास्य" वह है, जो वातावरण को हल्का-फुल्का बनाकर नीरसता को दूर करता है,

जबकि "उपहास" वह है, जिसमें किसी को ठेस पहुँचाने का भाव छिपा होता है।

किसी की बेवकूफी पर हँसना और किसी के साथ बेवकूफ बनकर हँसना—इन दोनों में गहरा फर्क है।

जब हम बच्चों की तरह सरलता से स्वयं पर भी हँसना सीख लेते हैं, तब हमारी हँसी किसी को आहत नहीं करती।

वैसे, मूर्ख बनना और बनाना भी एक कला है—और इसके लिए समझदारी की आवश्यकता होती है।

यदि कोई मज़ाक किया जाए और सामने वाला उसे समझ ही न पाए, तो मज़ाक भी अधूरा रह जाता है।

इसलिए किसी भी प्रकार का हास्य करते समय सामने वाले की मानसिकता को समझना आवश्यक है।

विज्ञापन का संसार भी इसी समझ पर टिका है।

लोगों की मनोवृत्ति को पहचानकर शब्दों को इस प्रकार सजाया जाता है कि वे आकर्षक लगें—और हम अनजाने में भ्रमित हो जाएँ।

जैसे—

किसी वस्तु पर "75% छूट" बड़े अक्षरों में लिखा जाता है, ताकि वह तुरंत ध्यान आकर्षित करे,

और बगल में छोटे अक्षरों में "अप टू" लिख दिया जाता है, जिसे अक्सर लोग देख ही नहीं पाते।

वहाँ पहुँचने के बाद सच्चाई पता चलने पर व्यक्ति स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है।

इसी प्रकार जूस सेंटर पर लिखा होता है—

"फलों के ताज़े रस की गारंटी",

जबकि फल भले ही बासी हों, पर रस तो ताज़ा ही निकाला जाता है।

एक और रोचक उदाहरण—

अदरक बेचने वाला कहता है "चाय वाली अदरक",

और चाय बेचने वाला कहता है "अदरक की चाय"।

दोनों ही अपनी-अपनी वस्तु को अधिक महत्वपूर्ण बनाकर प्रस्तुत करते हैं।

यहाँ कोई छल नहीं, बल्कि प्रस्तुति की सुंदरता है।

जब किसी बात को आकर्षक और सलीके से कहा जाता है, तो उसका प्रभाव स्वतः बढ़ जाता है।

लेकिन जब भगवान और धर्म का सहारा लेकर लोगों को गुमराह किया जाता है, तब यह स्थिति अत्यंत गंभीर हो जाती है।

लोगों की आस्था और भावनाओं का लाभ उठाकर, शब्दों के जाल में उलझाकर धन कमाना—आज एक सरल माध्यम बन गया है।

बचपन में हम एक खेल खेला करते थे—"स्टैच्यू!"

जिसमें जब भी कोई स्थिति हमारे विरुद्ध होती, हम सामने वाले को "स्टैच्यू" कहकर उसी क्षण रोक देते थे।

काश…

आज भी कोई ऐसा "स्टैच्यू" होता,

जो इस प्रकार की बेईमानी, छल और उपहास को उसी पल थाम लेता।

जीवन का सार…

हास्य केवल हँसी का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को गुनने की एक कला है।

यह हमें हल्का करता है, जोड़ता है, और भीतर की कड़वाहट को दूर करता है।

यदि हास्य में संवेदना, सहजता और आत्मस्वीकृति जुड़ जाए,

तो वही हँसी जीवन को सुंदर बना देती है।

आइए, हम ऐसी हँसी चुनें—

जो किसी का मन न दुखाए,

बल्कि जीवन को और अधिक अर्थपूर्ण और आनंदमय बनाए।

हास्य करें… उपहास नहीं।

रचनाकार

विजया डालमिया

(संपादक, 'मेरी निहारिका' 

और 

राष्ट्रीय संयोजिका 'उलझन सुलझन लेडीज लेखिका विंग')

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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