जिंदगी का अजीब ताना-बाना है

जिंदगी का अजीब ताना-बाना 

पीहर की बातें तो
महज एक बहाना है।
आँखों में अक्सर आ
जाती है नमी…क्योंकि
यादों में आज भी
बसता वही गुज़रा
ज़माना है…

अप्रैल आते ही पीहर जाने की ललक, यादों के साथ दिल में हिलोरें मारने लगती है। कच्ची कैरी की खुशबू की तरह लड़कियाँ महकने लगती हैं, तब माता-पिता को एहसास हो जाता है कि उनकी विदाई का वक्त आ गया है। बेटी की विदाई दुख और सुख की मिली-जुली ऐसी अनुभूति है, जिसे व्यक्त करना बहुत मुश्किल है—बस महसूस ही किया जा सकता है। आँसू सबकी आँखों में होते हुए भी दिल में तसल्ली होती है। विरोधाभास कई बार सकारात्मकता लिए होता है।

विदाई के साथ केवल माँ-बाप का साथ ही नहीं छूटता, बल्कि और भी बहुत सारी चीजें वहीं छूट जाती हैं। जैसे—वह लड़कपन, वह चंचलता भरी चाल, वह मस्ती भरी बातें, वह बेफिक्र-सी रातें, वह उनींदी-सी सुबह… सब कुछ वहीं छोड़ बेटियाँ बिना किसी मलाल के आँखों में नए सपने बसाकर नए सफर पर चल पड़ती हैं। जिस घर में उनकी ख्वाहिश हर वक्त बिना पंखों के उड़ती थी, वहीं से वे जिम्मेदारी और समझदारी के पंख लगाकर उड़ जाती हैं। घर में चिड़िया की तरह चहकने वाली जब नए आसमान में उड़ान भरती है, तो एक बार के लिए वह घबराती है, सहमती है; किंतु फिर उसे उसी आसमान से प्यार हो जाता है, क्योंकि उसकी दुनिया वहीं बस जाती है। किंतु अपना पहला घर—अपना पीहर—वह कभी बिसरा नहीं पाती।

बचपन की यादें वह कहानी हैं जिन्हें हम चाहे कितनी भी बार पढ़ लें, बोर नहीं होते। उन कहानियों में हमारी जिंदगी के सबसे खूबसूरत और मासूम पल होते हैं। हम बार-बार लौट जाते हैं उसी आँगन में, जहाँ हमारा पहला कदम उठा था। हमारी पहली किलकारी, जो सबके होठों पर मुस्कान ले आई थी, आज भी वहीं मुस्कुरा रही होती है।

वो वरांडा, वो कमरा, वो दीवान, वो गद्दे, वो आराम-कुर्सी—सब कुछ हमारे लिए अनमोल होते हैं। एक लंबे समय के बाद जब उन्हें छूते हैं, तो वही पहला स्पर्श महसूस होता है। तब वे हमें बेजान नहीं, बल्कि बोलते-दुलारते हुए से प्रतीत होते हैं।

खुद के घर में मेहमान बनकर जब बेटियाँ पीहर जाती हैं, तो बड़ी हसरत और प्यार से निहारती हैं हर वह कोना… जहाँ पड़ा रहता था उनका हर खिलौना। बातें होती थीं दुनिया भर की—कभी बंदर मामा से, तो कभी भालू दादा से। कभी गुड़िया रानी को सजाकर इतराती थीं, तो कभी रेलगाड़ी की छुक-छुक बनकर भागती-दौड़ती थीं।

कागज की कश्ती के साथ तैरना, कागज के रॉकेट के साथ उड़ान भरना, कागज के पंख बनाकर हवा का मज़ा लेना और कागज से ही बंदरवार बनाकर घर को सजाना… टीचर बनकर घर के दरवाजों को ब्लैकबोर्ड बना देना और फिर माँ की डाँट सुनना। सीढ़ियों को घिसरपट्टी बनाकर उन पर से फिसलना। खाली माचिस की डिब्बियों से सोफा बनाकर गर्व से खुश होना। खाली बोतलों में मिट्टी का तेल भरकर मोमबत्ती का खर्च बचाना और माँ की वाह-वाही लूटना—भला कोई कैसे भूल सकता है?

भाई-बहनों के साथ मंजन करते हुए नीचे थूकना, जो आज संभव नहीं। लाइन में बैठकर एक-दूसरे के सिर की जुएँ निकालना। रातों में उठकर खटमल चुनना और पानी में डालना—सबसे मुश्किल काम होता था, क्योंकि दोनों ही हाथों से वे बहुत जल्दी फिसल जाते थे। फेस-पैक लगाने पर भाई का हमें हँसाना… आज कहाँ है वह ज़माना?

रबर के जूतों पर पॉलिश की जगह तेल लगाकर चमकाना। स्कूल से आते ही खाने के लिए कुछ लेकर छत पर भाग जाना। टिक्कर-बिल्ला, लगोरी, लंगड़ी खेलकर थक जाना, फिर खाना और सो जाना—कहाँ है अब मेरा वो गुज़रा ज़माना?

किंतु तभी सब यादें मुस्कुराकर कहती हैं—“हम हैं ना…!”

घर का सूना आँगन आज भी बेसब्री से इंतज़ार करता है बेटियों का, जिनके पाँवों की धमक ने उसके सीने में हमेशा गुनगुनाती खनक दी। आम की डाली आज भी लहराते-झूमते हुए बाहें फैलाकर इंतज़ार करती है बेटियों का, जैसे कह रही हो—“हम संग झूले कहीं भूल तो नहीं गई?”

और तब ज़ुबान पर अपने आप आ ही जाता है यह गीत—
“कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन…”


रचयिता

विजया डालमिया
संपादक — मेरी निहारिका
राष्ट्रीय संयोजक
उलझन सुलझन (लेडीज़ लेखिका विंग)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 








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